लेखक: जी. बिबू
अनुवादक: बी.ब्यूला

यदि यह सत्य है कि बिना किसी भेदभाव के सब लोग पाप कर रहे हैं, तो यह कहने की आवश्यकता नहीं कि पाप कोई आदत नहीं, बल्कि स्वभाव है। सब लोगों में, सर्वत्र, और सभी कालों में दिखाई देने वाले पापी स्वभाव के विषय में जोनाथन एडवर्ड्स का दिया हुआ वर्णन यहाँ उचित है। 'जन्म-पाप' का सिद्धांत, मसीही दृष्टिकोण से यह समजाता है की मनुष्य स्वभाव से पापी क्यों है। जन्म-पाप का अर्थ यह नहीं कि ‘मेरा जन्म ही पाप है,’ बल्कि यह है कि ‘मैं जन्म से ही पापी हूँ।’ यह सिद्धांत वचन के अनुसार इसी सत्य की पुष्टि करता है की हम पाप करते हैं इसलिए पापी नहीं हैं; बल्कि हम पापी हैं इसलिए पाप करते हैं। जन्म से उपस्थित यह पाप हमारे भीतर विद्यमान पाप का मूल होने के कारण इसे ‘मूल-पाप’ भी कहा जाता है। आज बहुत से लोग ‘जन्म-पाप’ शब्द का उपयोग करके अनेक भ्रांतियाँ उत्पन्न करते हैं; इसलिए ऐसे संदर्भों में ‘मूल-पाप’ शब्द का प्रयोग करना अधिक उचित है। यही ऐतिहासिक रूप से कलीसिया द्वारा प्रयुक्त ‘ओरिजिनल सिन’ शब्द का सही अनुवाद है।

आदम का पाप उसके साथ उसकी सन्तान को भी पतन में ले आया (रोमियो 5:12-19)। आदम के समान पाप न करने वाले उसके वंशजों पर भी उसके पाप का परिणाम अर्थात मृत्यु आई (वचन 14)। वे स्वभावतः परमेश्वर के क्रोध के योग्य ठहराए गए थे (इफिसियों 2:3)। हम जन्म लेकर न भलाई और न बुराई करने से पहले ही, मसीह हमारे लिये मर गया, फिर भी वचन कहता है कि उस समय हम भक्तिहीन थे, पापी थे, और परमेश्वर के शत्रु थे (रोमियो 5:6, 8, 10)।वचन यह स्पष्ट रूप से सिखाता है की  भक्तिहीन होने के कारण हम जन्म से ही विपरीत बुद्धि वाले, असत्य बोलने वाले, मार्ग से भटके हुए  हैं, (भजन 58:3) और पापों तथा अपराधों के कारण मृत जन्मे हुए हम तब तक जीवित नहीं किए जा सकते, जब तक कि मसीह के साथ हमें जिलाया न जाए (इफिसियों 2:1)। अर्थात जब तक हम नये सिरे से जन्म न लें (यूहन्ना 3:3-6) तब तक परमेश्वर के राज्य में हमारा कोई भाग नहीं है। यह बात सुसमाचार की जड़ है, और यदि यही हम भूल करे तो सुसमाचार के सत्य से हट जाने का खतरा है। यदि कोई कहता है की यह सत्य नहीं है, तो उसे स्वीकार करना पड़ेगा कि मनुष्य जन्म से ही धर्मी है, उसका स्वभाव पवित्र है, और यदि उसे समाज या शैतान के सम्पर्क से बचाकर रखा जाए तो वह मसीह की धार्मिकता के बिना ही अपनी ओर से धर्मी बना रह सकता है। परन्तु यह कल्पना सुसमाचार को नष्ट करने वाली सभी युक्तियों में सबसे अधिक घातक है।

इस अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय को गलत समझने वाले लोग जो कुछ प्रश्न बार-बार उठाते हैं, उनमें से कुछ को यहाँ प्रस्तुत करके, उनके उत्तर देने का मैं प्रयास कर रहा हूँ। आशा है कि इससे कुछ भ्रांतियाँ दूर होंगी और कुछ लोगों को इस विषय का और अधिक सावधानी से परीक्षण करने में सहायता मिलेगी।

1) प्रश्न: यह कितनी भयावह शिक्षा है कि परमेश्वर ही हमें पापी रूप में उत्पन्न करता है! क्या आपका आशय यह है कि परमेश्वर ही पाप का कर्ता है?

जवाब: जब परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की, तब उसमें पाप नहीं था (प्रसंगवाक्य 7:29)। परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप और अपनी समानता में रचा (उत्पत्ति1:26-27)। परन्तु अवज्ञा के कारण मनुष्य उस पवित्र स्वरूप को खो बैठा, और फिर उसने अपनी ही समानता और अपने ही स्वरूप में सन्तान उत्पन्न की (उत्पत्ति 5:3)। अपनी जाति अपनी ही जाति को उत्पन्न करती है। इसलिए पाप में गिर चुके उन प्रथम दम्पति की सन्तान होने के कारण उनका स्वभाव ही सब पर चला आया।

बच्चों को उत्पन्न करने वाला परमेश्वर ही है (भजन 127:3)। परन्तु उनके भीतर पापी स्वभाव को रखने वाला वह नहीं है। क्योंकि वह जिस प्रकार आदम को रचा, उसी प्रकार सबको नहीं रचता। संतति उत्पन्न करने की प्राकृतिक व्यवस्था को परमेश्वर ने मनुष्य में स्थापित किया (उत्पत्ति1:28)। यदि वृक्ष बुरा हो तो उसका फल भी उसके स्वभाव के अनुसार ही होगा। गन्दे सोते से निर्मल जल कैसे निकल सकता है? उसी प्रकार पापग्रस्त मनुष्य से पापरहित उत्पत्ति सम्भव नहीं (अय्यूब 14:4)। इसका कारण आदम का अपराध है, न कि परमेश्वर की कोई भूल।

फिर भी परमेश्वर अत्यन्त अनुग्रहकारी है; इसलिए मनुष्य के द्वारा खोया हुआ परमेश्वर का पवित्र स्वरूप पुनः पाने की व्यवस्था उसने मसीह यीशु में की है (रोमियों 8:29; इफिसियों 2:10; इफिसियों 4:21-24; कुलुस्सियों 3:10; 1 यूहन्ना 3:2)। आदम में प्राप्त प्राकृतिक जन्म के कारण नहीं, परन्तु मसीह में प्राप्त अलौकिक नए जन्म के द्वारा ही हम फिर से परमेश्वर का स्वरूप धारण कर सकते हैं। धन्य है वह व्यक्ति जो इस पर आपत्ति नहीं करता कि जो स्वरूप उसे जन्म में नहीं मिला वह उसे यीशु में दिया गया।

2)प्रश्न: क्या यह कहना कि हम पापी स्वभाव के कारण पाप करते हैं, मनुष्य को अपनी जिम्मेदारी से बचने का अवसर नहीं देता? क्या यह सिद्धांत लोगों के हृदयों को कठोर नहीं बना देगा, मानो वे कह सकें कि पाप करना उनकी गलती नहीं है, बल्कि वे तो अपने स्वभाव के अनुसार ही आचरण कर रहे हैं?

जवाब: कुछ लोग वचन के सत्य को बहाने के रूप में उपयोग कर लेते हैं; परन्तु ऐसे लोगों के लिए सिद्धांतों को बदल देना भूल होगी। उदाहरण के लिए, वचन सिखाता है कि यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह क्षमा करता है (1 यूहन्ना 1:9)। इसी प्रकार हम रोमियों 5:20 में पढ़ते हैं कि जहाँ पाप बढ़ा, वहाँ अनुग्रह उससे भी बहुत बढ़ा। इसे कुछ लोग पाप करने के अवसर के रूप में ले सकते हैं। जब स्वीकार करने पर क्षमा उपलब्ध है, तब पाप छोड़ने की अपेक्षा पाप कर लेना और फिर मान लेना कई लोगों को सरल और सुखद लग सकता है।

परन्तु क्या इसलिए इन वचनों में निहित सत्यों का प्रचार रोक देना चाहिए? किसी सिद्धांत की सत्यता या असत्यता को निर्धारित करने के आधार यह नहीं हो सकते कि सब लोग सही अर्थ समझेंगे या नहीं, या यह कि कुछ लोग स्वार्थवश इन सत्यों को तोड़-मरोड़ देंगे। जिस प्रकार सभी सिद्धांतों को वचन की समग्र शिक्षा के प्रकाश में जाँच करनी होती है, उसी प्रकार ‘जन्म-पाप’ के सिद्धांत को भी परखना आवश्यक है। यदि वचनो के प्रकाश में वह सिद्धांत सत्य है, तो वह सत्य है; और यदि वचन से भिन्न है, तो असत्य है।

और जिन लोग जन्म-पाप के सत्य को ठीक प्रकार समझते है, वे परमेश्वर के अनुग्रह पर और भी अधिक निर्भर हो जाते हैं। स्वभावतः मुझ में जो पतन है, उसे मैं अपनी सामर्थ्य से पार नहीं कर सकता। कौन स्वभाव के विरुद्ध आचरण कर सकता है? हम अपने पतित स्वभाव को कितनी गंभीरता से पहचानते हैं  यह उस पर निर्भर करता है कि क्या हम सच-मुच स्वीकार करते हैं कि मन फिराव परमेश्वर की ओर से मिला पूर्णतः नि:शुल्क अनुग्रह-वरदान है और यह की लोगों के लिये जिनका मन सांसारिक है उनमे  न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन होने की इच्छा है और न ही सामर्थ्य।

3) प्रश्न: यह बात बाइबिल में कहाँ कही गई है की मनुष्य में जन्म से ही पाप का स्वभाव है और वह कोई काम किए बिना ही पापी है?

जवाब: बाइबल यह बताती है कि हर व्यक्ति पाप करने के लिये अपने ही भीतर की दुष्ट अभिलाषा से खिंचता और फँसता है। यह सत्य है कि शैतान और संसार आकर्षित करते हैं, परन्तु पाप को गर्भ में धारण कर उसे जन्म देने वाला मनुष्य के भीतर विद्यमान यही दुष्ट अभिलाषा है (यहूदा 1:13-14)। शिशु से लेकर वृद्ध तक, आयु के अनुसार इसी दुष्ट प्रवृत्ति का स्वरूप सभी में स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है। नये जन्म पाए हुए मनुष्य के भीतर इस पापी नियम और परमेश्वर द्वारा स्थापित नये स्वभाव के बीच होनेवाले संघर्ष का वर्णन प्रेरित ने रोमियों 7 में स्पष्ट किया है।यह जानते हुए भी की क्या अच्छा है और क्या बुरा, प्रेरित अपने भीतर एक ऐसा नियम कार्य करता पहचानता है जो उसे भलाई से रोकता है और बुराई की ओर झुकाता है। इसी को हम पाप स्वभाव कह रहे है।

यदि मनुष्य में यह अन्तःस्थ पाप-स्वभाव न हो, तो हम यह कह सकते हैं कि वह केवल अपनी स्वतंत्र इच्छा का गलत उपयोग करके पाप करता है। परन्तु बाइबल यह सिखाती है कि यह पाप-नियम स्वभावगत है। इसी कारण लिखा है कि स्वभाविक मनुष्य परमेश्वर की बातें ग्रहण नहीं कर सकता; वे उसे मूर्खता लगती हैं (1 कुरिन्थियों 2:14)। और यह भी कि शरीर के अनुसार मन रखना परमेश्वर से बैर रखना है (रोमियों 8:7)। मनुष्य ऐसी अशक्ति और अनिच्छा की दशा में है कि वह तब तक मसीह के पास नहीं आ सकता जब तक पिता उसे खींच न ले (यूहन्ना 6:44)। और यह कि लोग ज्योति की अपेक्षा अन्धकार को इसलिये प्रिय रखते हैं कि उनके काम बुरे हैं (यूहन्ना 3:19-20)।

यदि मनुष्य के पास केवल स्वतंत्र निर्णय शक्ति होती, और यदि शैतान तथा बाहरी परिस्थितियाँ ही पाप के लिये पर्याप्त कारण होतीं, तो यीशु मसीह को छोड़कर सभी लोग पाप को ही क्यों चुनते? जो लोग मनुष्य के भीतर की इस पतित प्रकृति का बाइबिलीय वर्णन नहीं मानते, उनके पास इसका क्या उत्तर है कि मनुष्य की कल्पनाएँ निरन्तर बुरी ही होती हैं (उत्पत्ति 6:5)? भक्तिहीनों में जन्म से ही विकृत बुद्धि क्यों होती है (भजन 58:3)? हर बालक के मन में मूढ़ता क्यों बसी रहती है (नीतिवचन 22:15)? हमें अशुद्ध करने वाली बातें बाहर से नहीं बल्कि हमारे हृदय से ही क्यों निकलती हैं (मरकुस 7:20-23)?

संसार के आकर्षण या शैतान के प्रलोभन का कितना भी उल्लेख किया जाए, तथ्य यह है कि हृदय स्वयं सबसे अधिक छलपूर्ण है और उसमें घोर रोग लगा है; उसे कोई समझ नहीं सकता (यिर्मयाह 17:9)। हृदय, स्वभाव, नीयति—जिस नाम से भी इसे पुकारें—पाप को उत्पन्न करने वाली यह अन्तःस्थ प्रवृत्ति बाइबल के अनुसार वास्तविक है। इस सत्य को अस्वीकार करने वाली किसी भी शिक्षा में उपर्युक्त प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं है। यह केवल प्रश्न ही नहीं, चुनौती भी है।

4) प्रश्न: यदि मनुष्य पापी स्वभाव के साथ जन्म लेते हैं, तो क्या मनुष्य रूप में जन्मे प्रभु यीशु में भी पापी स्वभाव था?

जवाब: परमेश्वर ने प्रभु यीशु को अन्य सब मनुष्यों के समान जन्म नहीं कराया। जिस मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया और जिसने सब को दोषी ठहराया (रोमियों 5:12), उस मनुष्य की सन्तान के रूप में वह उत्पन्न नहीं हुए (उत्पत्ति 3:15; गलातियों 4:4)। किसी भी मानवीय हस्तक्षेप के बिना स्वयं परमेश्वर ने पवित्र आत्मा के द्वारा मरियम के गर्भ में उनकी रचना की। इसी प्रकार अनन्त परमेश्वर-पुत्र के लिये परमेश्वर ने एक शरीर तैयार किया (यूहन्ना 1:1, 14; इब्रानियों 10:5)। इसलिए वह जन्म से ही पवित्र था और परमेश्वर का पुत्र कहलाया (लूका 1:34-35)। उन्होंने पापमय शरीर का स्वरूप धारण किया (रोमियों 8:4), परन्तु पापमय शरीर नहीं धारण किया (इब्रानियों 7:26-27)। वह मनुष्य के समान दिखाई दिए (फिलिप्पियों 2:7), परन्तु देहधारी परमेश्वर थे (यूहन्ना 1:14), इसलिए सर्वथा निष्पाप रहे (इब्रानियों 4:15)। उस दिन मसीह ने जो चुनौती दी थी की “तुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है?” वही आज भी चुनौती बनी हुई है (यूहन्ना 8:46)।

5) प्रश्न: हर व्यक्ति इसलिए परीक्षित होता है क्योंकि उसके भीतर की अपनी ही दुराशा उसे खींचती और फँसाती है (यहूदा 1:13-14)। और यीशु मसीह हर बात में हमारी नाईं परीक्षित हुए (इब्रानियों 4:15)। तो यदि वह हमारी नाईं परीक्षित हुए, तो क्या यह आवश्यक नहीं कि उनमें भी हमारी ही तरह कोई स्वकीय दुराशा रही हो?

जवाब: इब्रानियों 4:15 यह स्पष्ट रूप से बताता है कि वह सब बातों में हमारी नाईं परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि वह हर बात में हमारी तरह परीक्षित हुआ, परन्तु अन्तर में पापी स्वभाव के खिंचाव से आकर्षित होने के अर्थ में नहीं। यदि उसमें भी कोई स्वकीय दुराशा होती, तो “वह निष्पाप निकला” यह वचन निरर्थक हो जाता। ध्यान दीजिए—वह केवल पाप नहीं कर पाया, ऐसा नहीं; वह पाप रहित भी था। शैतान ने उसकी परीक्षा की (मत्ती 4:1-12)। संसार ने भी उसे अनेक प्रकार के दबावों में डाला (यूहन्ना 1:7)। परन्तु उसके भीतर ऐसी कोई प्रवृत्ति न थी जो पाप की ओर झुकती हो या पाप के प्रति सहमति देती हो। इसी कारण वह पाप में न गिरा। इस प्रकार प्रभु यीशु हमारी नाईं परीक्षित तो हुए, परन्तु हमारी नाईं दुराशा से खिंचे या बहकाए न गए—क्योंकि उनमें ऐसा कोई पापी स्वभाव था ही नहीं।

6)प्रश्न: क्या यह कहना अधिक उपयुक्त नहीं होगा कि प्रभु यीशु पाप कर सकते थे लेकिन किया नहीं, और इसी से उन्होंने पाप पर विजय पाई? यदि वे पाप कर ही नहीं सकते थे, तो उनके परीक्षित होने में महत्त्व ही क्या है?

जवाब: प्रभु यीशु केवल पूर्ण मनुष्य ही नहीं, वरन् पूर्ण परमेश्वर भी हैं। देहधारी होकर संसार में आना ही उनका गौरव है। परमेश्वर पाप नहीं कर सकता (तीतुस 1:2). यह कहना कि यीशु पाप कर सकते थे, उनके दैवत्व का इनकार करना है। यह स्मरण रखना आवश्यक है कि यह कहना कि उन्होंने पाप पर विजय प्राप्त करके पवित्र आत्मा को अर्जित किया उससे कहीं महान यह सत्य है कि वे स्वभाव से ही पवित्र थे। ऐसे विचार, जो उनके “गौरव” को बढ़ाने के नाम पर उनके दैवत्व को आघात पहुँचाएँ, उनसे हमें बहुत सतर्क रहना चाहिए।

7) प्रश्न: यदि यीशु में भी हमारी ही तरह पाप की ओर आकर्षित होने वाली प्रवृत्ति होती और वह उसे जीत लेते, तभी वे हमारे लिये आदर्श ठर सकते थे। परन्तु यदि वे पाप से सर्वथा परे थे, तो हम उनके समान पाप पर विजय कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

जवाब: यह बात पहले समझनी चाहिए की पाप पर विजय दिलाने में प्रभु यीशु केवल हमारे आदर्श ही नहीं, बल्कि हमें समयोजित सहायता देने वाले भी हैं (इब्रानियों 4:15)। आदर्श के विषय में देखें तो स्वयं पिता-परमेश्वर, जो कभी देहधारी नहीं हुए, फिर भी पवित्रता के विषय में हमारे लिये आदर्श ठहराए गए हैं (मत्ती 5:48; 1 पतरस 1:15-16; लैव्यव्यवस्था 11:44; 19:2; 20:7)। हम परमेश्वर के इस आदर्श को कैसे अपनाएँ? इसके लिये हमें केवल एक मार्गदर्शक या एक उदाहरण की आवश्यकता नहीं; हमें ऐसे सहायक की आवश्यकता है जो हमें फिर से उसी पवित्र दैवीय स्वभाव में गढ़ दे। जब हम यह पहचान लेते हैं कि उनके सिद्ध आदर्श की नकल करके हम स्वभावतः उस मानदण्ड तक पहुँच नहीं सकते, तब हम सचमुच उनके अनुग्रह-सिंहासन के निकट खींचे जाते हैं। तब हम उनकी समयोचित सहायता पर निर्भर होते हैं (इब्रानियों 4:16)। और अन्ततः हम मसीह के स्वरूप में, उनके सिद्ध पवित्र स्वभाव में परिवर्तित किए जाते हैं (रोमियों 8:29; 1 यूहन्ना 3:2)।

8) प्रश्न: जन्म-पाप के सिद्धांत को न जानने से क्या नुकसान है?

जवाब: जन्म-पाप का सिद्धांत हमें पाप की उत्पत्ति, उससे समस्त मानवजाति में आई भ्रान्ति और भ्रष्टता, तथा उससे उद्धार पाने के लिये परमेश्वर ने मसीह में की हुई अनुग्रहपूर्ण व्यवस्था इन सब का सुसमाचारिक, समग्र और सही बोध कराता है। इस मूल शिक्षा को समझे बिना सुसमाचार के सत्य को सही प्रकार ग्रहण करना सम्भव नहीं। सब लोग सार्वभौमिक रूप से पाप क्यों करते हैं? यीशु मसीह में छोड़कर कोई भी किसी और तरीके से धर्मी क्यों नहीं ठहर सकता? मसीही के भीतर होने वाले आत्मिक संघर्ष को कैसे समझना चाहिए? ऐसे निर्णायक प्रश्नों का उत्तर देने वाली वचनानुसार समग्र शिक्षा यदि खो जाए, तो वह स्वयं मसीही विश्वास को खो देने के समान ही है। इस सिद्धांत को न मानने वाले मसीही कहलाने योग्य नहीं रहते। यह सबसे बड़ी हानि नहीं तो और क्या?

समापन:

आदम ने अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके पाप किया। उसके परिणामस्वरूप उसकी संतान सब पापी हुई और उसी की भाँति मृत्यु के वश में आई। इस पतन से पापरहित का उत्पन्न होना सम्भव न था; इसलिए स्वयं परमेश्वर मनुष्य बनकर आया और पाप का प्रायश्चित्त किया (1 कुरिन्थियों 15:22, 45-47)। यही जन्म-पाप सिद्धांत का सार है। और इस सुसमाचार के अतिरिक्त यदि कोई और सुसमाचार सुनाए, तो वे शापग्रस्त हैं (गलातियों 1:8-9)।

 

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