यह रचना किसी को दोष देने के लिए नहीं लिखी गई है।और न तो यह तय करने के लिए कि कौन परमेश्वर की संतान है और कौन नहीं। सच तो यह है कि जो परमेश्वर की संतान नहीं हैं, उनका इस विषय से कोई संबंध ही नहीं है। जिन्हें उद्धार नहीं मिला, वे क्रिस्मस मनाएँ तो क्या? न मनाएँ तो क्या? आज के समय मै जिनका यीशु मसीह के साथ कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं है, वे भी बड़े धूमधाम और दिखावे के साथ क्रिस्मस मना रहे हैं। बाहर स्टार, भीतर बार – यही उनकी रीति है! दूसरी ओर, ऐसे कई उपसमूह है, जो यीशु मसीह की दैवत्व, पवित्र आत्मा की दैवत्व और वचन में प्रकट त्रित्व की सत्यता को नकारते हैं, वे क्रिस्मस नहीं मनाते। इसलिए क्रिस्मस मनाने वाले सब भक्ति-परायण नहीं होते, और क्रिस्मस न मनाने वाले सब सत्यनिष्ठ भी नहीं होते। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हम इस विषय को वचन के अनुसार जाँचें ही नहीं। बुनियादी बाइबिल समझ किसी को भी यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि क्रिस्मस वचन के अनुसार नहीं है। लेकिन परमेश्वर के संतान भी इस सत्य को छिपाने और अपनी अंतरात्मा को शांत करने के लिए बहुत से बहाने बताते हैं। वास्तव में ये बहाने उनकी सत्यनिष्ठा को प्रश्नरधक बनाती है। जैसे इस उत्सव का कोई वचन-आधार नहीं, वैसे ही इन बहानों का भी कोई आधार नहीं हैं। इन्हीं बहानों को उजागर करने के उद्देश्य से यह रचना आपके सामने रख रहा हूँ। इस विवाद के सभी बहानो की विस्तृत जाँच इस लेख में सम्भव नहीं। परन्तु केवल वे कुछ बहाने, जो सामान्यतः सुनाई देते हैं, उन्हें मुख्य बिंदुओं के रूप में रखकर, उनसे संबंधित कुछ विचार यहाँ संकलित किए हैं। गहन अध्ययन के साथ-साथ आत्म-परीक्षण के लिए भी यह कुछ लोगों को प्रेरित करे इसी प्रार्थना के साथ इसे आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।
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