यदि यह सत्य है कि बिना किसी भेदभाव के सब लोग पाप कर रहे हैं, तो यह कहने की आवश्यकता नहीं कि पाप कोई आदत नहीं, बल्कि स्वभाव है। सब लोगों में, सर्वत्र, और सभी कालों में दिखाई देने वाले पापी स्वभाव के विषय में जोनाथन एडवर्ड्स का दिया हुआ वर्णन यहाँ उचित है। 'जन्म-पाप' का सिद्धांत, मसीही दृष्टिकोण से यह समजाता है की मनुष्य स्वभाव से पापी क्यों है। जन्म-पाप का अर्थ यह नहीं कि ‘मेरा जन्म ही पाप है,’ बल्कि यह है कि ‘मैं जन्म से ही पापी हूँ।’ यह सिद्धांत वचन के अनुसार इसी सत्य की पुष्टि करता है की हम पाप करते हैं इसलिए पापी नहीं हैं; बल्कि हम पापी हैं इसलिए पाप करते हैं। जन्म से उपस्थित यह पाप हमारे भीतर विद्यमान पाप का मूल होने के कारण इसे ‘मूल-पाप’ भी कहा जाता है। आज बहुत से लोग ‘जन्म-पाप’ शब्द का उपयोग करके अनेक भ्रांतियाँ उत्पन्न करते हैं; इसलिए ऐसे संदर्भों में ‘मूल-पाप’ शब्द का प्रयोग करना अधिक उचित है। यही ऐतिहासिक रूप से कलीसिया द्वारा प्रयुक्त ‘ओरिजिनल सिन’ शब्द का सही अनुवाद है।
यह जोनाथन एडवर्ड्स द्वारा 8 जुलाई 1741 को मैसाचुसेट्स में किया गया एक अद्भुत उपदेश है। व्यवस्थाविवरण 32:35 यह वचन चेतावनी देती है कि परमेश्वर का गुस्सा अविश्वासी, दुष्ट इस्राएलियों पर 'उनके पांव फिसलने के समय' आएगा। परमेश्वर की वाचा के लोग होते हुए, परमेश्वर की कृपा के सभी साधन होने, और परमेश्वर के उनके लिए किए गए कई अजूबों को देखने के बावजूद, वे "सोच-विचार न रखने वाली जाति" (व्यवस्थाविवरण 32:28), बिना समझ वाले लोग बने हुए हैं। इस वचनोभाग से पहले के दो वचनों में कहा गया है कि परमेश्वर की खेती के नीचे रहकर भी उन्होंने कड़वे, विषैले अंगूर ही उत्पन्न किए; इन दुष्ट इस्राएलियों पर आने वाली सज़ा और नाश के संदर्भ में, इस वचन में से मैंने लिया हुआ “उनके पांव फिसलने के समय” यह वाक्य निम्न अर्थों को देता है।
© 2024. इस वेबसाइट के सभी अधिकार biblepravakta.com के हैं।