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लेखक: G. Bibu
अनुवादक: B. Beulah

विषय-सूची

कुछ बुनियादी प्रश्न - उत्तर

परमेश्वर त्रिएक है — इस बात का प्रमाण

निष्कर्ष

I. कुछ बुनियादी प्रश्न - उत्तर

1) प्रश्न: परमेश्वर त्रिएक है, इसका क्या अर्थ है?

उत्तर: बाइबल बहुत स्पष्टता से बताती है कि परमेश्वर केवल एक ही है। साथ ही, बाइबल उस एक ही परमेश्वर के पूर्ण ईश्वरीय नामों, गुणों और कार्यों को तीन अलग-अलग व्यक्तियों—पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को समान रूप से सौंपती है। "परमेश्वर एक ही है"—इस सत्य से ज़रा भी समझौता किए बिना, इन तीनों व्यक्तियों के पूर्ण परमेश्वरत्व को स्वीकार करने वाली शिक्षा को ही "त्रिएकत्व का सिद्धांत" कहा जाता है।

परमेश्वर एक ही है; लेकिन यह एक परमेश्वर तीन व्यक्तियों में अस्तित्व रखता है। इसका अर्थ यह नहीं कि तीन अलग-अलग परमेश्वर मिलकर एक व्यक्ति बने हैं; न ही इसका यह अर्थ है कि यदि परमेश्वर के तीन टुकड़े किए जाएँ तो तीनों व्यक्ति एक-एक हिस्सा हैं और तीनों को जोड़ने पर पूरा परमेश्वर बनता है। पिता पूरी तरह से परमेश्वर हैं, पुत्र पूरी तरह से परमेश्वर हैं, और पवित्र आत्मा भी पूरी तरह से परमेश्वर हैं—फिर भी वे तीन अलग-अलग परमेश्वर नहीं, बल्कि एक ही परमेश्वर हैं।

इसका यह भी अर्थ नहीं है कि पिता ही पुत्र हैं, या पुत्र ही पवित्र आत्मा हैं; या फिर पुराने नियम के समय में पिता बनकर, नए नियम के समय में पुत्र बनकर और वर्तमान समय में पवित्र आत्मा बनकर—एक ही व्यक्ति ने अलग-अलग युगों में तीन अलग-अलग भूमिकाएँ निभाई हैं। ऐसा सोचना पूरी तरह से गलत है। पिता पुत्र नहीं हैं, पुत्र पवित्र आत्मा नहीं हैं, और पवित्र आत्मा न तो पिता हैं और न ही पुत्र। पिता केवल पिता हैं, पुत्र केवल पुत्र हैं, और पवित्र आत्मा केवल पवित्र आत्मा हैं।

इसलिए इन तीनों को एक ही व्यक्ति कहना, या तीन अलग परमेश्वर कहना, या परमेश्वर के तीन भाग बताना, या फिर एक ही व्यक्ति द्वारा निभाई गई तीन अलग-अलग भूमिकाएँ कहना—इनमें से कोई भी विचार त्रिएकत्व की सच्ची शिक्षा का हिस्सा नहीं है। परमेश्वर एक ही है, और वही एक परमेश्वर तीन व्यक्तियों में अपनी हस्ती और अस्तित्व रखता है। यही त्रिएकत्व के सिद्धांत की सही परिभाषा है।

2) प्रश्न: जब "त्रित्व" या "त्रिएक" शब्द बाइबल में कहीं है ही नहीं, तो फिर यह बाइबल आधारित शिक्षा कैसे हुई?

उत्तर: बाइबल की शिक्षा को अपने शब्दों में समझाना या व्यक्त करना बिल्कुल भी गलत नहीं है। हर हफ्ते, हर कलीसिया में उपदेश के दौरान यही होता है। परमेश्वर ने खुद कलीसिया में वचन की सेवा ठहराई और उपदेशकों को नियुक्त किया, ताकि वे अपने शब्दों में परमेश्वर के वचन की सच्चाई को स्पष्ट कर सकें। अनेक शब्दों से भरा एक पूरा उपदेश गलत नहीं होता, क्योंकि उसके ज़रिए परमेश्वर के वचन का सत्य ही बाँटा जा रहा होता है।

उसी तरह, यदि "त्रित्व" या "त्रिएक" जैसे एक छोटे से शब्द के ज़रिए बाइबल के एक गहरे सत्य को सही तरीके से समझाया जा सकता है, तो इसमें क्या हर्ज़ है? हमें यह देखना चाहिए कि उस शब्द के पीछे का विचार बाइबल में है या नहीं। केवल यह कहकर विरोध करना कि "यह शब्द बाइबल में नहीं है, इसलिए यह वचन का सत्य नहीं हो सकता," ऐसा तर्क देने वालों की आत्मिक समझ की कमी को ही दर्शाता है।

3) प्रश्न: आख़िर हमें इस त्रिएकत्व सिद्धांत के विवाद में पड़ने की ज़रूरत ही क्या है?

उत्तर: परमेश्वर ने बाइबल में अपना परिचय खुद दिया है। "मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना"—यह आज्ञा तभी अर्थपूर्ण बनती है जब हम परमेश्वर की उस परिभाषा को समझें जो उसने खुद अपने बारे में दी है। यदि परमेश्वर के विषय में हमारी समझ उसके अपने दिए हुए परिचय से अलग है, तो असल में हम बाइबल के परमेश्वर की आराधना नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपनी ही कल्पना से गढ़े हुए किसी झूठे ईश्वर की आराधना करने के गंभीर जोखिम में पड़ रहे हैं।

यदि बाइबल परमेश्वर का परिचय तीन व्यक्तियों वाले एक ही परमेश्वर के तौर पर देती है, तो अन्य एकेश्वरवादी धर्मों की तरह उसे केवल एक अकेला व्यक्ति मानना, या बहुदेववादियों की तरह एक से अधिक परमेश्वर मानना, या अपनी मर्ज़ी से कोई नया सिद्धांत उस पर थोपना—सीधे तौर पर "दूसरों को ईश्वर न मानना" की आज्ञा का उल्लंघन करना है। इसलिए, परमेश्वर की हर संतान के लिए यह गहराई से जाँचना बहुत ज़रूरी है कि बाइबल परमेश्वर को कैसे परिभाषित करती है और क्या "त्रित्व" शब्द का अर्थ उस बाइबलीय परिभाषा से मेल खाता है या नहीं।

4) प्रश्न: जब त्रिएकत्व को मानने वाले खुद कहते हैं कि इसे पूरी तरह समझना नामुमकिन है, तो जिसे समझ ही नहीं सकते उसके लिए इतनी माथापच्ची क्यों?

उत्तर: परमेश्वर को पूरी तरह और संपूर्ण रूप से समझ पाना किसी भी इंसान के बस की बात नहीं है, क्योंकि परमेश्वर का एक मुख्य स्वभाव यह है कि वह "असीम और अगम्य" है। अगम्य का अर्थ है—जहाँ तक हमारी बुद्धि पहुँच न सके। वह हमारी इंसानी सोच, कल्पना और तर्क से परे अनंत परमेश्वर है। लेकिन साथ ही, परमेश्वर ने अपने वचन में जितना खुद को प्रकट किया है, उतना उसे जानना पूरी तरह संभव और आवश्यक है।

जो लोग अपनी मनगढ़ंत परिभाषाएँ बनाकर यह डींगें हाँकते हैं कि उन्होंने परमेश्वर को पूरी तरह समझ लिया है, उनकी नज़रों में भले ही हम कमज़ोर लगें; फिर भी परमेश्वर ने अपने वचन में जितनी सीमा तक अपना परिचय दिया है, उतनी ही सीमा में रहकर उसे जानना हमारी ज़िम्मेदारी है। इस अध्ययन में हमारा मकसद परमेश्वर के पूरे रहस्य को सुलझाना नहीं है, बल्कि अपनी सोच को वचन में दिए गए परमेश्वर के आत्म-परिचय से मिलाकर उसी सीमा में बनाए रखना है। सरल शब्दों में कहें तो, यह त्रित्व के रहस्य को पूरी तरह समझने की कसरत नहीं, बल्कि यह जाँचने की ईमानदार कोशिश है कि क्या त्रिएकत्व का सिद्धांत वास्तव में बाइबल का सत्य है या नहीं।

5) प्रश्न: क्या त्रिएकत्व को न मानने से इंसान स्वर्ग नहीं जा पाएगा?

उत्तर: यह सवाल ठीक वैसा ही है जैसे कोई पूछे: "क्या अच्छे काम करने से मैं स्वर्ग चला जाऊँगा?" जिस तरह अच्छे काम करने से कोई उद्धार नहीं कमा सकता, उसी तरह केवल सही सिद्धांत को मान लेने से भी उद्धार नहीं मिल जाता। बाइबल साफ सिखाती है कि उद्धार केवल परमेश्वर के मुफ्त अनुग्रह से मिलता है (इफिसियों 2:8-9)।

परंतु उस मुफ्त अनुग्रह ने मेरे भीतर सच्चा उद्धार का कार्य किया है, इसका सबूत क्या है? इसके दो पक्के प्रमाण हैं:

  1. परमेश्वर ने जिन भले कामों को हमारे लिए पहले से तैयार किया है, उनमें चलने का सच्चा प्रेम और ललक होना (इफिसियों 2:10, तीतुस 2:14)।
  2. परमेश्वर के प्रकट किए गए पूरे सत्य से सहमत होना और खरी शिक्षा पर दृढ़ रहना (यूहन्ना 8:47, 10:26-27, 1 यूहन्ना 4:6)।

जिस तरह भले काम करने से उद्धार नहीं मिलता, फिर भी जो भले काम बिल्कुल नहीं करता उसके पास उद्धार का कोई सबूत नहीं होता; ठीक वैसे ही, केवल त्रिएकत्व या किसी सिद्धांत को रट लेने से उद्धार नहीं मिलता, लेकिन परमेश्वर के प्रकट किए गए सत्य को जानबूझकर ठुकराने वाले के पास भी उद्धार का कोई प्रमाण नहीं बचता।

II. परमेश्वर त्रिएक है — इस बात का प्रमाण

परमेश्वर के विषय में बाइबल द्वारा सिखाए गए तीन बुनियादी सत्यों को जब हम एक शब्द में समेटते हैं, तो उसे "त्रित्व" या "त्रिएक" कहते हैं। इसलिए परमेश्वर त्रिएक है यह सिद्ध करने के लिए केवल यह दिखाना काफी है कि ये तीन बुनियादी बातें बाइबल में मौजूद हैं:

  1. परमेश्वर एक ही है।
  2. उस एक परमेश्वर के अस्तित्व में बहुलता (अर्थात् एक से अधिक व्यक्ति) है।
  3. परमेश्वर में मौजूद यह बहुलता केवल तीन व्यक्तियों—पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा तक ही सीमित है।

यदि ये तीनों बातें वचन की सच्चाई हैं, तो यह अपने आप साबित हो जाता है कि परमेश्वर तीन व्यक्तियों का अस्तित्व रखने वाला एक ही परमेश्वर है। यही त्रिएकत्व का सार है। आइए अब वचन से इन तीनों की जाँच करें:

1) परमेश्वर एक ही है

"तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना" (निर्गमन 20:3)—इस पहली ही आज्ञा में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया है कि परमेश्वर एक ही है, और उसका स्थान व पद किसी और को नहीं दिया जा सकता। यही सत्य पूरी बाइबल में बार-बार दोहराया गया है:

यह केवल पुराने नियम की ही शिक्षा नहीं है; नया नियम भी इसी स्पष्टता के साथ इस सत्य पर ज़ोर देता है:

अतः बाइबल आदि से अंत तक इसी बात पर अटल है कि परमेश्वर केवल एक ही है। इस सत्य को नकारने वाली कोई भी शिक्षा सीधे तौर पर वचन के विरुद्ध है।

2) परमेश्वर में बहुलता (अनेक व्यक्तियों का होना) है

बाइबल जितनी दृढ़ता से यह कहती है कि परमेश्वर एक ही है, उतनी ही साफगोई से यह भी प्रकट करती है कि इस एक ही परमेश्वर में बहुलता (एक से अधिक व्यक्तियों का होना) है। जैसे एक इंसान केवल एक ही व्यक्ति होता है, ज़रूरी नहीं कि परमेश्वर का अस्तित्व भी इंसान की तरह सीमित हो। परमेश्वर के अस्तित्व की तुलना सृष्टि की किसी भी चीज़ से नहीं की जा सकती। वह एक ही परमेश्वर है, फिर भी एक से अधिक व्यक्तियों में उसका अस्तित्व है—बाइबल इसे बिना किसी संशय के साबित करती है।

आइए, इसके चार मुख्य प्रमाणों को देखें:

A) परमेश्वर के लिए उपयोग किए गए बहुवचन शब्द उसके भीतर बहुलता को सिद्ध करते हैं:

"हे इस्राएल, सुन, यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक ही है।" (व्यवस्थाविवरण 6:4)

यहाँ "एक" के लिए मूल इब्रानी (हिब्रू) भाषा में "एख़ाद" (Echad) शब्द का प्रयोग हुआ है। "एख़ाद" शब्द उस एकता को दर्शाता है जिसमें एक से अधिक व्यक्ति मिलकर एक होते हैं (Compound Unity)। उदाहरण के लिए, विवाह में स्त्री और पुरुष मिलकर "एक तन" (एख़ाद) बनते हैं। जैसे हम कहें—"हम सब भारतवासी एक हैं", यहाँ अनेक लोगों की सामूहिक एकता को दर्शाने वाला इब्रानी शब्द "एख़ाद" है। इसके विपरीत, जहाँ केवल और केवल एक ही अकेला व्यक्ति या वस्तु हो, वहाँ इब्रानी भाषा में "याख़ीद" (Yachid) शब्द इस्तेमाल होता है।

परमेश्वर के लिए "याख़ीद" (अकेला व्यक्ति) शब्द प्रयोग करने का पूरा विकल्प होने के बावजूद, पवित्र शास्त्र में जानबूझकर "एख़ाद" शब्द चुना गया। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि परमेश्वर अपनी उस एकता को प्रकट कर रहा है जिसके भीतर अनेक व्यक्तियों की उपस्थिति समाई हुई है।

B) परमेश्वर का अपने बराबर वाले व्यक्तियों से बातचीत करना उसके अस्तित्व में बहुलता को सिद्ध करता है:

क्या परमेश्वर ने कभी अपने बराबर वालों से बात की? क्या "परमेश्वर के बराबर" कहना सही है? हमारे प्रभु यीशु के विषय में साफ लिखा है: "उसने परमेश्वर के तुल्य (बराबर) होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।" (फिलिप्पियों 2:6)। इसलिए यह कोई मनगढ़ंत बात नहीं है। अब सोचिए, परमेश्वर के बराबर यदि कोई हो सकता है, तो वह कौन होगा? निश्चय ही स्वयं परमेश्वर ही!

वचन में देखिए जहाँ परमेश्वर अपने बराबर के व्यक्तियों से बात करता है:

"हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ..." (उत्पत्ति 1:26)

यहाँ ध्यान दीजिए—उसने यह नहीं कहा कि "मैं बनाऊँगा", बल्कि कहा: "हम... बनाएँ।" कुछ लोग कहते हैं कि यह केवल राजाओं जैसा सम्मानसूचक बहुवचन है। परंतु गहराई से देखें—वह कार्य करने के लिए कह रहा है: "आओ, हम बनाएँ"। यह किसी अन्य को साथ मिलकर सृष्टि करने का सीधा आमंत्रण है।

चूँकि सृष्टि करने का काम केवल परमेश्वर ही कर सकता है और बाइबल परमेश्वर के अलावा किसी दूसरे को सृष्टिकर्ता नहीं मानती, इसलिए यह बातचीत स्वर्गदूतों या प्रकृति के साथ नहीं हो सकती। यह बातचीत ईश्वरीय व्यक्तियों के आपस में ही हो रही थी। बाइबल साफ बताती है कि सृष्टिकर्ता केवल पिता ही नहीं (इफिसियों 3:9), बल्कि यीशु मसीह भी हैं (यूहन्ना 1:1-3), और केवल यीशु ही नहीं, पवित्र आत्मा भी हैं (उत्पत्ति 1:2, अय्यूब 33:4)। अतः यहाँ आपस में बात करने वाले व्यक्ति कौन हैं, इसे पहचानना बिल्कुल कठिन नहीं है।

डॉ. जॉन गिल ने त्रिएकत्व के समर्थन में लिखी अपनी पुस्तक में एक ऐतिहासिक तथ्य का ज़िक्र किया है: जब यहूदी धर्मशास्त्रियों ने देखा कि उत्पत्ति 1:26 के शब्द ("हम मनुष्य को बनाएँ") ईसाइयों के त्रिएकत्व (परमेश्वर में बहुलता) की बात को मजबूती देते हैं, तो उन्होंने अपनी व्याख्या में एक काल्पनिक कहानी जोड़ दी। कहानी यह गढ़ी गई कि जब मूसा यह वचन लिख रहे थे, तो वे रुक गए और पूछा, "हे प्रभु, क्या ऐसा लिखने से विरोधियों को उँगली उठाने का मौका नहीं मिलेगा?" तब परमेश्वर ने कहा, "तू लिख, जिसे गुमराह होना है वह होगा ही।" यह किस्सा चाहे जैसा भी हो, यह इस सच्चाई को साबित करता है कि इस वचन में अनेक व्यक्तियों का भाव इतना प्रबल है कि विरोधियों को उससे बचने के लिए कैसी-कैसी कहानियाँ गढ़नी पड़ीं!

ऐसे कई अन्य संदर्भ भी हैं:

ये सभी घटनाएँ प्रमाणित करती हैं कि परमेश्वर में एक से अधिक व्यक्ति मौजूद हैं।

C) "यहोवा के दूत" का प्रकट होना परमेश्वर में बहुलता को सिद्ध करता है:

पुराने नियम में अक्सर एक विशेष व्यक्ति का प्रकटीकरण दिखाई देता है, जिसे "यहोवा का दूत" कहा गया है। लेकिन यह दूत कोई साधारण स्वर्गदूत जैसे जिब्राईल या मीकाईल नहीं था। इस दूत के पास भेजने वाले यहोवा का ही नाम और अधिकार था, इसलिए उसे कई स्थानों पर स्वयं "यहोवा" या "परमेश्वर" कहा गया है। उदाहरण के लिए:

यहोवा का नाम धारण करने वाला यह अद्भुत दूत आख़िर कौन है? जंगल की यात्रा के दौरान परमेश्वर ने इस्राएलियों से कहा था: "मैं तेरे आगे-आगे एक दूत भेजता हूँ... उसका विरोध न करना... क्योंकि मेरा नाम उस में रहता है।" (निर्गमन 23:20-21)। प्रेरित पौलुस इसी घटना की याद दिलाते हुए हमें सचेत करते हैं कि जिस तरह उन्होंने उस समय मसीह को परखा था, वैसे हम न परखें (1 कुरिन्थियों 10:9)। इससे स्पष्ट है कि पुराने नियम में "यहोवा का दूत" होकर प्रकट होने वाले स्वयं प्रभु यीशु मसीह ही थे। मीका 5:2 की भविष्यवाणी भी यही कहती है कि बेतलेहेम में जन्म लेने वाले शासक का निकास "प्राचीनकाल से, बल्कि अनादिकाल से" होता आया है।

"मैं जो हूँ" (अनादि अस्तित्व) का गुण केवल सच्चे परमेश्वर का है। जब यह गुण यहोवा के भेजे हुए इस दूत में भी पाया जाता है, तो यह परमेश्वर के भीतर एक से अधिक व्यक्तियों के अस्तित्व को पूरी तरह सिद्ध करता है।

D) एक ही संदर्भ में एक से अधिक व्यक्तियों को "यहोवा" या "परमेश्वर" कहा जाना:

"तब यहोवा ने सदोम और अमोरा पर यहोवा के पास से आकाश से गन्धक और आग बरसाई।" (उत्पत्ति 19:24)

यहाँ ध्यान से देखें: आग और गंधक किसने बरसाई? यहोवा ने। किसके पास से बरसाई? स्वर्ग में उपस्थित यहोवा के पास से। यानी पृथ्वी पर न्याय की घोषणा करने वाला भी यहोवा है, और स्वर्ग से आग बरसाने वाला भी यहोवा है। एक ही घटना में दो अलग-अलग व्यक्तियों को "यहोवा" कहा गया है।

कुछ लोग कहते हैं कि यह सिर्फ भाषा की एक शैली है और व्यक्ति एक ही है। लेकिन आमोस 4:11 इस बात को और साफ़ कर देता है, जहाँ स्वयं यहोवा कहता है: "मैंने तुम में से कितनों को ऐसे उलट दिया जैसे परमेश्वर ने सदोम और अमोरा को उलट दिया था... तौभी तुम मेरी ओर न फिरे, यहोवा की यही वाणी है।" यहाँ बोलने वाला यहोवा कह रहा है कि जिस तरह परमेश्वर ने नाश किया था, वैसे ही मैंने भी किया। यानी बोलने वाला यहोवा अलग व्यक्ति है और सदोम को नाश करने वाले परमेश्वर का ज़िक्र एक अलग व्यक्ति के नाते हुआ है।

परमेश्वर के लिए बहुवचन का प्रयोग, उसका अपने बराबर वालों से बात करना, यहोवा के दूत का स्वयं यहोवा कहलाना, और एक ही संदर्भ में एक से अधिक व्यक्तियों को "यहोवा" या "परमेश्वर" कहकर पुकारा जाना—ये सब अचूक रूप से साबित करते हैं कि परमेश्वर में एक से अधिक व्यक्ति मौजूद हैं।

3) परमेश्वर में मौजूद बहुलता केवल पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा—इन तीन व्यक्तियों तक ही सीमित है

हमने देखा कि परमेश्वर एक है और उसमें बहुलता है। अब प्रश्न उठता है कि इस बहुलता में कितने व्यक्ति हैं? पवित्र शास्त्र दिखाता है कि समान ईश्वरीय नाम, गुण और कार्य केवल और केवल तीन व्यक्तियों—पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को ही दिए गए हैं।

(यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि जब हम कहते हैं कि ईश्वरीय नाम इन तीनों को समान रूप से दिए गए हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि 'पिता' नाम पुत्र का है, या 'पुत्र' नाम पवित्र आत्मा का है। ये तीन नाम तो इन तीनों व्यक्तियों की अलग-अलग पहचान बताने वाले विशेष नाम हैं। इन व्यक्तिगत नामों के अलावा बाकी सभी ईश्वरीय नाम, गुण और महिमा इन तीनों पर समान रूप से लागू होते हैं। इसलिए पिता को पुत्र नहीं कह सकते, पुत्र को पवित्र आत्मा नहीं कह सकते, और पवित्र आत्मा को पिता या पुत्र नहीं कह सकते। हर एक को उसके अपने विशिष्ट नाम और पहचान से ही संबोधित किया जाना चाहिए।)

आइए देखें कि कैसे ये तीनों व्यक्ति समान रूप से ईश्वरीय हैं:

A) "परमेश्वर" की उपाधि: शास्त्र केवल पिता को ही परमेश्वर नहीं कहता (यूहन्ना 17:3), बल्कि पुत्र को (यूहन्ना 1:1, 14) और पवित्र आत्मा को भी परमेश्वर कहता है (प्रेरितों के काम 5:3-4)। बाइबल में कुछ अन्य लोगों (जैसे न्यायियों या दूतों) को भी प्रतिनिधि के तौर पर यह शब्द दिया गया है, लेकिन इन तीनों व्यक्तियों के पास जो वास्तविक ईश्वरीय अधिकार और गुण हैं, वे किसी अन्य सृष्टि के पास नहीं हैं।

B) "यहोवा" नाम: यह नाम परमेश्वर के नित्य और स्वयंभू होने को दर्शाता है। शास्त्र पिता को यहोवा कहता है (निर्गमन 23:20), पुत्र को भी यहोवा कहता है (यशायाह 48:12-16), और पवित्र आत्मा को भी "यहोवा" पुकारता है (2 शमूएल 23:2-3, यशायाह 63:14, इब्रानियों 3:7-11)।

C) सृष्टिकर्ता होना: सृष्टि करने का सामर्थ्य केवल परमेश्वर का है। शास्त्र पिता को सृष्टिकर्ता कहता है (इफिसियों 3:9), पुत्र को सृष्टिकर्ता कहता है (यूहन्ना 1:2-3), और पवित्र आत्मा को भी सृष्टिकर्ता बताता है (अय्यूब 33:4, भजन संहिता 33:6)।

D) उद्धारकर्ता होना: अनंत उद्धार केवल परमेश्वर दे सकता है। पिता उद्धारकर्ता हैं (2 थिस्सलुनीकियों 2:13), पुत्र उद्धारकर्ता हैं (तीतुस 2:13), और पवित्र आत्मा भी हमें नया जन्म देकर उद्धार का कार्य पूरा करते हैं (तीतुस 3:5, यूहन्ना 3:6)।

E) मसीह का देहधारण: परमेश्वर का मनुष्य बनना केवल परमेश्वर का ही कार्य था, और इसमें इन तीनों व्यक्तियों की सहभागिता स्पष्ट दिखाई देती है (यशायाह 48:12-16, लूका 1:35)।

F) प्रभु यीशु का बपतिस्मा: धार्मिकता को पूरा करने वाले इस स्वर्गीय कार्य में तीनों व्यक्ति प्रत्यक्ष उपस्थित थे—पुत्र जल में, पवित्र आत्मा कबूतर की नाईं उतरे और पिता की वाणी स्वर्ग से सुनाई दी (मत्ती 3:13-17, मरकुस 1:10-11)।

G) पवित्र आत्मा का भेजा जाना: प्रभु यीशु ने खुद बताया कि पिता उनके नाम से पवित्र आत्मा को भेजेंगे—यहाँ भी तीनों व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट है (यूहन्ना 14:16-17)।

H) क्रूस पर प्रभु का बलिदान: अनंत धार्मिकता प्राप्त करने वाले उस बलिदान में तीनों व्यक्ति शामिल थे—पिता जिनके सामने भेंट चढ़ाई गई (जकर्याह 13:7), पुत्र जिन्होंने अपने प्राण दिए (यूहन्ना 10:17), और सनातन आत्मा जिसके द्वारा यह बलिदान दिया गया (इब्रानियों 9:14)।

I) प्रभु का जी उठना: मसीही विश्वास की नींव यानी पुनरुत्थान में तीनों व्यक्तियों की सामर्थ्य काम कर रही थी—पिता ने जिलाया (रोमियों 6:4), पुत्र ने स्वयं अपने प्राण वापस लिए (यूहन्ना 2:19, 10:18), और पवित्र आत्मा ने जिलाया (रोमियों 8:11)।

J) बपतिस्मे की आज्ञा: प्रभु ने स्वयं आज्ञा दी कि "पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम में" बपतिस्मा दो (मत्ती 28:19)। प्रेरितों के काम में जब लिखा है कि शिष्यों ने यीशु के नाम में बपतिस्मा दिया (प्रेरितों के काम 2:38, 19:5), तो कुछ लोग यह गलत निष्कर्ष निकालते हैं कि यह त्रिएक आज्ञा से हटकर केवल यीशु का बपतिस्मा था। असल में, प्रेरितों के काम में "मसीह के नाम में" कहने का अर्थ यह स्पष्ट करना था कि यह मसीही बपतिस्मा है (यहूदी या यूहन्ना के बपतिस्मे से अलग), न कि प्रभु की त्रिएक आज्ञा को बदलना (लूका 24:44, प्रेरितों 15:26, 26:9, रोमियों 15:20)।

K) प्रेरितिक आशीष वचन: प्रेरितों ने इन तीनों व्यक्तियों के नाम से कलीसिया को आशीष दी (2 कुरिन्थियों 13:14, प्रकाशितवाक्य 1:4-5)। पुत्र से अनुग्रह, पिता से प्रेम और पवित्र आत्मा से सहभागिता माँगना असल में उन तीनों से प्रार्थना करना ही है। और प्रार्थना केवल परमेश्वर से की जा सकती है।

इन सभी प्रमाणों से साफ है कि इस ईश्वरीय दायरे में न तो किसी चौथे व्यक्ति को जोड़ा जा सकता है, और न ही इन तीनों में से किसी एक को घटाया जा सकता है। इसलिए एक ही परमेश्वर में मौजूद यह बहुलता केवल और केवल इन तीन व्यक्तियों तक सीमित है—न तीन से कम, न तीन से अधिक।

निष्कर्ष

बाइबल जिस परमेश्वर को हमारे सामने प्रकट करती है, वह तीन व्यक्तियों में अस्तित्व रखने वाला केवल एक ही परमेश्वर है। जो ईश्वर इंसानी बुद्धि और दर्शनशास्त्र के छोटे से ढाँचे में आसानी से समा जाए, वह दरअसल इंसान की अपनी कल्पना की उपज होता है। हमारी बुद्धि से परे इस त्रिएक परमेश्वर को हम केवल उसके अपने वचन के प्रकाशन के ज़रिए ही जान सकते हैं।

यदि परमेश्वर ने वचन में अपना यह सच्चा परिचय न दिया होता, तो हम भी अन्य एकेश्वरवादियों की तरह उसे केवल एक अकेला व्यक्ति मान बैठते, या मूर्तिपूजकों की तरह अनेक देवी-देवताओं पर विश्वास करते, या सर्वेश्वरवादियों की तरह यह सोचते कि सृष्टि और ईश्वर एक ही हैं। ये सारी बातें मानवीय तर्क में आसानी से समा जाती हैं। परंतु, "एक ही परमेश्वर तीन व्यक्तियों में अस्तित्व रखता है, तीनों पूर्ण परमेश्वर हैं, फिर भी तीन परमेश्वर नहीं बल्कि एक ही परमेश्वर हैं"—यह सच्चाई मानवीय तर्क की उपज नहीं, बल्कि इंसानी तर्क से परे (अलौकिक) सत्य है। इसलिए वह हमारी कल्पना, समझ और दर्शनशास्त्र से कहीं ऊँचा और अगम्य है।

संसार में उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। हम किसके साथ उसकी बराबरी करें? इसीलिए पूरी सृष्टि में ऐसा कोई मॉडल या मिसाल नहीं है जो त्रिएक परमेश्वर को पूरी तरह समझा सके। उदाहरण देकर त्रित्व को समझाने की हर कोशिश अधूरी और व्यर्थ साबित होती है। लोग अक्सर अंडा, पानी, आग, सूर्य या मनुष्य की आत्मा-प्राण-देह जैसे उदाहरण देते हैं। परंतु ये सभी उदाहरण केवल तीन हिस्सों, तीन अवस्थाओं या तीन गुणों वाली किसी एक ही वस्तु की मिसालें हैं।

उदाहरण के लिए, यदि सूर्य को लें—तो उसमें आग, गर्मी और रोशनी होती है। लेकिन आग अपने आप में पूरा सूर्य नहीं है, न रोशनी पूरी तरह सूर्य है, न गर्मी पूरी तरह सूर्य है। परंतु परमेश्वर के विषय में—पिता पूरी तरह परमेश्वर हैं, पुत्र पूरी तरह परमेश्वर हैं, और पवित्र आत्मा पूरी तरह परमेश्वर हैं, फिर भी वे तीन नहीं, एक ही परमेश्वर हैं।

इसी तरह पानी बर्फ, तरल और भाप बन सकता है। यदि एक ही व्यक्ति समय-समय पर कभी पिता, कभी पुत्र, तो कभी पवित्र आत्मा बनकर आता (Modalism), तो पानी का उदाहरण कुछ हद तक सही बैठता; लेकिन पानी का उदाहरण भी त्रित्व को समझाने के लिए बिल्कुल गलत है, क्योंकि हम पहले ही देख चुके हैं कि पिता कभी पुत्र नहीं बनते और पुत्र कभी पवित्र आत्मा नहीं बनते। वे तीन अलग-अलग व्यक्ति हैं। इसलिए दुनिया का कोई भी भौतिक उदाहरण परमेश्वर के त्रिएक अस्तित्व (तीन व्यक्तियों में एक परमेश्वर) की पूरी बराबरी नहीं कर सकता।

पवित्र त्रिएकत्व को पूरी तरह अपनी सीमित बुद्धि से समझ पाना संभव नहीं है; केवल इतना ही संभव है कि हम बाइबल के वचनों के आधार पर यह पक्का विश्वास करें कि हमारा परमेश्वर त्रिएक है। और यह भी केवल तभी संभव है जब हम पवित्र शास्त्र के वचनों का निष्पक्ष और व्यवस्थित अध्ययन करें, जैसा कि इस लेख में किया गया है। इसके अलावा बाकी सभी मानवीय प्रयास व्यर्थ हैं।

परमेश्वर का वचन सत्य है। उसमें जो कुछ प्रकट किया गया है, वह मेरी समझ में पूरी तरह आए या न आए, वह पूरी तरह विश्वासयोग्य है। इसलिए बाइबल का यह त्रिएक परमेश्वर भले ही मेरी सीमित इंसानी बुद्धि में पूरी तरह न समाए, फिर भी वही एकमात्र सच्चा जीवित परमेश्वर है। इसके विपरीत परमेश्वर के विषय में गढ़ा गया हर विचार झूठा है और वह वचन से बाहर किसी काल्पनिक ईश्वर को बनाने की धृष्टता है। परमेश्वर की हर संतान को ऐसी हर गलत शिक्षा का विरोध और खंडन करना चाहिए।

आइए, हम केवल सच्चे, जीवित और पवित्र त्रिएक परमेश्वर पर ही विश्वास करें, उसी की आराधना करें और उसी का प्रचार करें। उसके सिवा दूसरा कोई परमेश्वर नहीं है!