परिचय
यह रचना किसी को दोष देने के लिए नहीं लिखी गई है।और न तो यह तय करने के लिए कि कौन परमेश्वर की संतान है और कौन नहीं। सच तो यह है कि जो परमेश्वर की संतान नहीं हैं, उनका इस विषय से कोई संबंध ही नहीं है। जिन्हें उद्धार नहीं मिला, वे क्रिस्मस मनाएँ तो क्या? न मनाएँ तो क्या? आज के समय मै जिनका यीशु मसीह के साथ कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं है, वे भी बड़े धूमधाम और दिखावे के साथ क्रिस्मस मना रहे हैं। बाहर स्टार, भीतर बार – यही उनकी रीति है! दूसरी ओर, ऐसे कई उपसमूह है, जो यीशु मसीह की दैवत्व, पवित्र आत्मा की दैवत्व और वचन में प्रकट त्रित्व की सत्यता को नकारते हैं, वे क्रिस्मस नहीं मनाते। इसलिए क्रिस्मस मनाने वाले सब भक्ति-परायण नहीं होते, और क्रिस्मस न मनाने वाले सब सत्यनिष्ठ भी नहीं होते। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हम इस विषय को वचन के अनुसार जाँचें ही नहीं। बुनियादी बाइबिल समझ किसी को भी यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि क्रिस्मस वचन के अनुसार नहीं है। लेकिन परमेश्वर के संतान भी इस सत्य को छिपाने और अपनी अंतरात्मा को शांत करने के लिए बहुत से बहाने बताते हैं। वास्तव में ये बहाने उनकी सत्यनिष्ठा को प्रश्नरधक बनाती है। जैसे इस उत्सव का कोई वचन-आधार नहीं, वैसे ही इन बहानों का भी कोई आधार नहीं हैं। इन्हीं बहानों को उजागर करने के उद्देश्य से यह रचना आपके सामने रख रहा हूँ। इस विवाद के सभी बहानो की विस्तृत जाँच इस लेख में सम्भव नहीं। परन्तु केवल वे कुछ बहाने, जो सामान्यतः सुनाई देते हैं, उन्हें मुख्य बिंदुओं के रूप में रखकर, उनसे संबंधित कुछ विचार यहाँ संकलित किए हैं। गहन अध्ययन के साथ-साथ आत्म-परीक्षण के लिए भी यह कुछ लोगों को प्रेरित करे इसी प्रार्थना के साथ इसे आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।
बहाने - उनके उत्तर
१. यह बहुत छोटा विषय है
“क्या क्रिस्मस वचन के अनुरूप है?”—इस प्रश्न को तुच्छ मानते हुए बहुत से लोग ऐसे बोलते हैं मानो यह चर्चा के योग्य भी न हो। मुझे प्रसन्नता है कि यह प्रश्न, भले ही केवल इसी कारण से ही क्यों न हो, इतनी हलचल उत्पन्न करने वाले इस विश्वव्यापी उत्सव को वास्तव में एक अत्यंत छोटा विषय होने के रूप में पहचान दिलाने में सहायक सिद्ध हुआ। परन्तु यहाँ विचारणीय बात यह नहीं कि कोई विषय छोटा है या बड़ा; वास्तविक प्रश्न यह है कि वह वचनानुसार है या नहीं। अनेक लोग यह कहकर इसे उचित ठहराते हैं कि वे इसे अत्यधिक भक्ति-भाव से मनाते हैं, संसार की रीति के अनुसार नहीं, बल्कि सत्यपूर्ण आराधना की भावना से मनाते हैं, और यह सुसमाचार सुनाने का एक अवसर भी प्रदान करता है। ऐसे अनेक आत्मसमर्थन के बीच इस महत्त्वपूर्ण दिन को वचनानुसार परीक्षण से बचाने के लिए इसे मात्र एक “बहुत छोटा विषय” कह देना क्या क्रिस्मस को समर्थित करने वालों के साथ न्याय कहलाएगा? और यदि किसी को ऐसा न भी प्रतीत हो, तो भी कोई आपत्ति नहीं; जैसा कहा जाता है, इसे छोटा विषय ही मान लिया जाए—तब भी इसे एक निश्चित महत्त्व प्राप्त होगा। क्योंकि यदि यह ज्ञात हो जाए कि हम छोटी बातों में कितने निष्ठावान हैं, तो बड़ी बातों में हमारी स्थिति क्या होगी, यह कहने की आवश्यकता नहीं रहती; यह सिद्धान्त स्वयं हमारे प्रभु ने सिखाया है (लूका 16:10). फिर भी, किसी एक विषय की तुलना में दूसरा विषय महत्त्व में छोटा दिख सकता है, तथापि अपने आप में कोई विषय वास्तव में छोटा नहीं होता। जिस बात में उसे करते समय कोई छोटापन दिखाई नहीं देता, वही बात जब जाँच के लिए प्रस्तुत की जाती है, तब अचानक छोटी प्रतीत होने लगती है; और किसी भी परीक्षण को तुच्छ ठहराने का इससे सरल उपाय और कोई नहीं।किन्तु हमें तो सदैव इस लिखित दायित्व को आदरपूर्वक स्मरण रखना है कि हम सब बातों की परीक्षा करें और जो भला है उसी को ग्रहण करें, तथा समस्त प्रकार की बुराई से दूर रहें (1 थिस्सलुनीकियों 5:22).
परन्तु वस्तुतः यह विषय किसी भी प्रकार से छोटा नहीं है। यहाँ समस्या केवल क्रिस्मस तक सीमित नहीं रहती; यह तो आराधना के नियमों से संबंधित एक गंभीर प्रश्न है। परमेश्वर की आराधना किस प्रकार की जाए, इस विषय में निश्चय करने का अधिकार आराधना ग्रहण करने वाले परमेश्वर का है या आराधना अर्पण करने वाले मनुष्य का ? इस प्रश्न का बाइबल में केवल एक ही उत्तर मिलता है, और वह यह कि यह अधिकार केवल परमेश्वर का है। मनुष्य को वही आराधनापद्धति आचरण करनी चाहिए जिसे परमेश्वर ने निर्धारित किया है। मनुष्य द्वारा गढ़ी गई आराधना कितनी भी गंभीरता, सत्यता या भक्ति-भाव से अर्पित की जाए, परमेश्वर न तो उसे स्वीकार करता है और न ही उसे मान्यता देता है। कैन से लेकर (उत्पत्ति 4:5–7) उज्जा तक (2 शमूएल 6:6) पवित्रशास्त्र में उल्लिखित प्रत्येक मनुष्य-निर्मित आराधना का वृत्तांत इसी सिद्धांत को स्पष्ट रूप से सिखाता है। नया नियम भी इसी नियम का समर्थन करता हुआ दिखाई देता है (मत्ती 15:6–9, मत्ती 28:20, प्रेरितों के काम 2:42, 2 थिस्सलुनीकियों 2:15)। अतः क्रिस्मस सहित परमेश्वर की आराधना के रूप में की जाने वाली प्रत्येक क्रिया को वचन के प्रकाश में अवश्य जाँचना चाहिए। जो कोई यह स्वीकार करता है कि “परमेश्वर की आराधना कोई साधारण बात नहीं, अत्यंत गंभीर है; उस पर परमेश्वर की स्वीकृति अवश्य होनी चाहिए; वही स्वीकार्य है जिसे वह स्वीकार करता है,” वह न तो ऐसी जाँच को अनावश्यक मानेगा, न अतिशय उत्सुकता समझेगा, और न ही इसे महत्वहीन ठहराएगा।
२. क्या सब कुछ बाइबल में होता है?
समर्थकों और आलोचकों दोनों को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि क्रिस्मस नामक यह प्रथा प्रेरितो के परंपरा का भाग नहीं है। न तो यह वचन की किसी आज्ञा से स्थापित हुई, और न ही किसी प्रेरित के उदाहरण से; इसके विपरीत, यह उस प्रथा में से है जो प्रेरितों के युग के समाप्त होने के कई शताब्दियों बाद कलीसिया में प्रविष्ट हुई। यह बात मान भी ली जाए, तो भी कुछ लोग व्यंग्यपूर्वक यह पूछते हैं कि “क्या हम जो कुछ भी करते हैं वह सब बाइबल में लिखा है? दाँत साफ करने के बारे में बाइबल कहाँ कुछ कहती है?” और इस प्रकार उपहासपूर्ण हँसी के साथ यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि क्रिस्मस का बाइबिलीय आधार न होना कोई गंभीर विषय नहीं। परन्तु ध्यान देने की आवश्यकता है कि बाइबल में कहीं नियम नहीं कि मनुष्य को दैनिक कार्य–व्यवहार उसी प्रकार करना चाहिए जैसा परमेश्वर ने शास्त्र में निर्दिष्ट किया है; किन्तु यह सिद्धांत प्रारम्भ से ही स्पष्ट रूप से प्रकट है कि मनुष्य को उस रीति से आराधना करनी चाहिए जैसे परमेश्वर ने बताया है। अतः क्रिस्मस जैसी प्रथा के लिए वचनाधार है या नहीं यह पूछना, और दाँत साफ करने जैसी बात को उपहासपूर्वक उसके समकक्ष ठहराना—इन दोनों में कितना गहरा अंतर है, इसे समझ सकने की बुद्धि के लिए पहले प्रार्थना करने की विनती करता हु।
३. यह तो हम प्रभु को स्मरण करने के लिए कर रहे है न?
बहुत-से लोग ईमानदारी के साथ यह प्रश्न उठाते हैं कि “जब यह उत्सव प्रभु के हमारे लिए पृथ्वी पर आगमन को स्मरण करने के लिए ही है, तो ऐसा स्मरण करना भी क्या अनुचित है?” परन्तु इस प्रश्न का उत्तर दो–तीन दृष्टिकोणों से विचार करना आवश्यक है। प्रथम, प्रभु ने स्वयं यह निर्धारित किया है कि उन्हें किस प्रकार स्मरण किया जाए, और वह विधि वचन में स्पष्ट रूप से दी गई है (लूका 22:19,20)। यदि वही विधि उन्हें स्मरण करने के लिए पर्याप्त न होती, तो किसी दूसरी विधि को अतिरिक्त रूप से गढ़ने की आवश्यकता पड़ती; परन्तु प्रभु द्वारा स्वयं स्थापित की गई स्मरण-पद्धति को अपर्याप्त मानना जितना विचित्र है, उतना ही अनुचित भी।
द्वितीय, जब प्रभु के जन्म-दिवस को बाइबिलीय आधार पर निश्चित करना असम्भव नहीं, तो फिर किसी भी शास्त्रीय प्रमाण के बिना 25 दिसंबर को प्रभु के जन्म-दिवस के रूप में अपनाने का कारण क्या है? इसका इतिहास किससे छिपा है? किसी भी विश्वकोश को देख लेने भर से यह स्पष्ट हो जाता है कि अनेक रोमन कैथोलिक प्रयासों में जिनमें मूर्तिपूजक आचरणों को मसीही रूप प्रदान करके मसीहता को कलुषित किया गया उसी क्रम में सूर्य-देव ‘सोल इन्विक्टस’ के सम्मान में मनाए जाने वाले मूर्तिपूजक उत्सवों को प्रभु यीशु के जन्मोत्सव के रूप में कलीसिया पर आरोपित किया गया। “अन्यजातियाँ अपने देवताओं के लिए जो कुछ करती हैं, तुम मेरे लिए वैसा न करना” (व्यवस्थाविवरण 12:30-31) जैसी स्पष्ट और कठोर आज्ञा की उपेक्षा करते हुए यह विचार करना कि वे अपने देवताओं के लिए करते थे, परन्तु मैं उसी विधि को येसु-प्रभु के लिए बदलकर ग्रहण कर लेता हूँ ऐसा अधिकार न किसी व्यक्ति को, न किसी कलीसिया को बाइबल ने कभी दिया है।
तृतीय, यह असत्य, जो इस निरर्थक आपत्ति को जन्म देता है कि “क्या समस्या केवल तिथि की है, या सम्पूर्ण वृत्तांत ही कल्पित है?”, परंपरागत प्रथाओं के सहारे ही अब तक टिका हुआ है। और जब मनुष्य ऐसी परंपराओं को थामे खड़ा रहता है, तब परमेश्वर का वचन निर्बल न हो जाए—इसकी रक्षा कौन कर सकता है? (मत्ती 15:6–9).
४. जब दूसरी और तीसरी शताब्दी में ही प्रभु के जन्म से संबंधित अनेक भिन्न–भिन्न तिथियाँ स्वयं मसीही समुदाय द्वारा प्रस्तावित की गई थीं, तब यह कहना कहाँ तक न्यायसंगत है कि क्रिस्मस की शुरुआत एक मूर्तिपूजक प्रथा को क्रिस्तीकरण करने के लिए हुई थी ?
क्रिस्मस का मूर्तिपूजक आचरणों से कोई संबंध नहीं है—ऐसा सिद्ध करने के लिए कुछ आधुनिक मसीही विद्वान जो प्रमुख तर्क प्रस्तुत करते हैं, उनमें यह भी एक है। उनका कहना है कि 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला रोमी उत्सव ‘सोल-इन्विक्टस’ सम्राट औरिलियन ने सन् 274 में प्रारम्भ किया; परन्तु कई वर्ष पहले ही हिप्पोलिटस नामक एक कलीसियाई लेखक ने यही तिथि प्रभु यीशु के जन्म-दिवस के रूप में प्रस्तावित की थी।
इसका उत्तर देने के लिए कुछ तथ्य ध्यान में रखने आवश्यक हैं। प्रेरितकाल समाप्त होने के कुछ ही वर्षों पश्चात् अलेक्ज़ान्द्रिया के कलीसिया-शिक्षक क्लेमेंट नामक व्यक्ति ने प्रभु के जन्म के विषय में उस समय प्रचलित अनेक तिथियों की सूची पहली बार प्रकाशित की। यद्यपि उन तिथियों में से किसी को भी तब तक कोई उत्सव-स्वरूप नहीं दिया गया था, फिर भी लगभग प्रत्येक माह की कोई न कोई तिथि उस सूची में सम्मिलित थी। यदि यह तथ्य स्वीकार किया जाए, तो यह विचार और भी महत्वपूर्ण हो उठता है कि जब चौथी शताब्दी के मध्य (336 ईस्वी के बाद) से रोमन साम्राज्य में क्रिस्मस को क्रमशः सार्वत्रिक रूप से स्थापित किया गया, तब प्रभु के जन्म के लिए वर्षों से प्रस्तावित अनेक तिथियों में से अंततः केवल 25 दिसंबर को ही मानक रूप में क्यों ग्रहण किया गया? जब बाइबल में उपलब्ध ऐतिहासिक संकेतों से यह तिथि स्पष्टतः मेल नहीं खाती, और जब उससे अधिक समुचित तथा अधिक संभावित तिथियाँ विद्यमान थीं, तब भी कलीसिया पर इसी तिथि को आरोपित करने का क्या कारण था? इस चयन को उस समय रोमी समाज में पहले से प्रचलित 'सोल-इन्विक्टस' जैसे मूर्तिपूजक उत्सव को मसीही रूप देकर आगे बढ़ाने की प्रक्रिया के रूप में क्यों न समझा जाए?
उतना ही नहीं “A DISSERTATION ON THE RISE AND PROGRESS OF POPERY” नामक अपने ग्रंथ में डॉ. जॉन गिल ने अनेक प्रमाणों सहित यह स्पष्ट दिखाया है कि कलीसिया पर कुछ विशेष उत्सव-दिन आरोपित करने की परंपरा सर्वप्रथम मौन्टेनस जैसे कुछ अपदर्शनात्मक समूहों से सम्बद्ध व्यक्तियों द्वारा प्रारम्भ की गई थी। प्रेरितिक अधिकार के बाहर इस प्रकार निर्मित की गई मनगढ़ंत आराधना-पद्धतियों का यही संचय क्रमशः विकसित होकर रोमन कैथोलिक व्यवस्था के रूप में अपनी पराकाष्ठा तक पहुँचा। और यदि केवल तर्क प्रस्तुत करने के लिए यह मान भी लिया जाए कि इन सब विधियों का प्रत्यक्ष रूप से किसी मूर्तिपूजक प्रथा से सम्बन्ध नहीं था, तब भी इस सत्य को कौन अस्वीकार कर सकता है कि ये सब मात्र मानव-निर्मित आचरण थे, न कि प्रेरितों से प्राप्त परंपरा? इसी कारण केवल इतना सिद्ध कर देना पर्याप्त नहीं कि क्रिस्मस का मूर्तिपूजक पृष्ठभूमि से कोई सम्बन्ध नहीं; आवश्यक यह भी है कि यह प्रमाणित किया जाए कि इसका वचन में आधार है, और इस प्रकार यह मनुष्य-कल्पित विधि नहीं। जब तक यह सिद्ध न हो, तब तक किसी भी मूर्तिपूजक आचार या उत्सव को कलीसिया पर आरोपित करने का अधिकार किसी को प्राप्त नहीं।
५. जब मैं अपना जन्मदिन मनाता हूँ, तो अपने प्रभु का जन्मदिन कैसे न मनाऊँ?
कुछ लोग भावावेश के साथ यह कहते हैं कि “जब मैं अपना जन्मदिन मनाता हूँ, तो अपने प्रभु का जन्मदिन कैसे न मनाऊँ? चाहे प्रभु 25 दिसंबर को न भी जन्मे हों, किसी न किसी दिन तो जन्मे ही थे; यदि हम उसी स्मरणार्थ इस दिन को मान लें तो इसमें अनुचित क्या है?” यह तर्क देखने में चाहे कितना भी उचित प्रतीत हो, परन्तु यह भी उन अनेक असंगत कारणों में से एक है जिनसे क्रिस्मस को उचित ठहराने का प्रयास किया जाता है। यदि वास्तव में उद्देश्य प्रभु के ही जन्म-दिवस को मनाना है, तो रोमनों द्वारा निश्चित की गई किसी मूर्तिपूजक उत्सव-तिथि से चिपके रहने की कोई बाध्यता नहीं। क्योंकि वह तिथि सम्पूर्ण रूप से एक अविश्वासी पृष्ठभूमि से कलीसिया में प्रविष्ट हुई थी। इससे कहीं अधिक, बाइबल हमें ऐसी दिशा प्रदान करती है जिसके आधार पर हम उस दिन का अनुमान कर सकते हैं जिसे प्रभु के जन्म-दिवस के रूप में कहीं अधिक उचित रूप से स्वीकार किया जा सके।यद्यपि शास्त्र में उसका पूर्ण विवरण उपलब्ध नहीं, फिर भी उस तिथि को पहचानने हेतु किस दिशा में विचार करना चाहिए इस विषय में मैं कुछ संकेत प्रस्तुत करता हूँ।
जब ज़करयाह अबीयाह के वर्ग में अपने याजकीय कार्य का निर्वाह कर रहा था, उसी समय एक स्वर्गदूत उसके सम्मुख प्रकट होकर बपतिस्मा देने वाले यूहन्ना के जन्म का समाचार सुनाता है (लूका 1:5)। चौबीस वर्गों में विभाजित याजक-वर्गों में अबीयाह का वर्ग आठवाँ था (1 इतिहास 24:10)। यहूदी पंचांग की हमारे कैलेंडर से तुलना करने पर यह बात बिना बहुत अधिक अनुसन्धान के ही स्पष्ट हो जाती है कि अबीयाह का वर्ग मंदिर में सेवा जून माह के आसपास करता था। यदि उसी समय एलीशाबेत गर्भवती हुई हों, तो उससे छह महीने बाद मरियम गर्भवती हुई। इस प्रकार यदि मरियम का गर्भधारण दिसंबर में हुआ, तो हमारे प्रभु का जन्म अगले वर्ष सितंबर अथवा अक्टूबर के महीनों में होना चाहिए। ठीक इसी समय इस्राएल में “मण्डपों का पर्व” (Feast of Tabernacles) मनाया जाता था। शास्त्र यह दर्शाता है कि व्यवस्था की रीति-प्रथाएँ मसीह की पूर्वछाया थीं। और वह परमेश्वर जिसने “जगत का पाप उठा ले जाने वाले परमेश्वर के मेम्ने” को उसके बलिदान की पूर्वछाया के रूप में पास्का के दिन ही वध होने के लिए ठहराया, वही यदि इम्मानुएल के रूप में मनुष्यों के बीच अपना डेरा करने के लिए कोई दिवस चुनता, तो उसका “मण्डपों का पर्व” के समय पर होना वचनानुसार उचित और संगत तर्क है।
यदि हमारे भक्तिभाव का वास्तविक केन्द्र सचमुच प्रभु का जन्म ही है, तो मूर्तिपूजक प्रथाओं को क्रिस्तीकरण करके कलीसिया में लाई गई तिथि को त्यागकर, यहूदी पंचांग से “मण्डपों का पर्व” का समय जानकर जिसका बाइबिल में कुछ आधार विद्यमान है उसी दिन प्रभु के जन्म का स्मरण क्यों न किया जाए? मुझे भली-भाँति ज्ञात है कि कुछ लोग कहेंगे, “दिन से क्या अंतर पड़ता है!” परन्तु ऐसा कहना तो तभी उचित होता जब तिथि के निर्धारण की कोई भी सम्भावना न होती। परन्तु जब वर्तमान क्रिस्मस दिवस को कोई वचनाधार नहीं, और दूसरी तिथि के लिए शास्त्र में कुछ आधार उपलब्ध है, तब भी यदि वही बहाने दोहराए जाएँ, तो यह सरलता का नहीं, बल्कि मन की सत्यनिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। इससे तो यही प्रमाणित होता है कि यीशु–प्रभु का जन्म 25 दिसंबर की परंपरा को बनाए रखने का वास्तविक कारण नहीं, बल्कि केवल एक निराधार बहाना मात्र है।
परन्तु यह सब तो केवल तर्क के लिए प्रस्तुत किया गया तथ्य मात्र है; वास्तव में मेरा उद्देश्य सितंबर में कोई नया उत्सव-दिन प्रारम्भ करने का नहीं है। क्योंकि जैसा मैंने पहले कहा, “प्रभु का भोज” ही उन्हें स्मरण करने के लिए पर्याप्त है। यदि उसके साथ किसी जन्मोत्सव की भी आवश्यकता होती, तो प्रभु स्वयं उसे कलीसिया में स्थापित करते। परन्तु यदि समस्या यह है कि प्रभु का जन्मदिन न मनाने से तुम अपना जन्मदिन भी नहीं मना सकते, तो कम-से-कम इतना तो उचित प्रतीत होता है कि किसी और का जन्मदिन प्रभु को न सौंपकर, वास्तव में वही दिन मनाया जाए जिसे उनका जन्मदिन माना जाता है। यदि कोई कहे कि कल हम कृष्णाष्टमी को ही यीशु–प्रभु के जन्मदिवस के रूप में ग्रहण कर लें, तो क्या यह मसीह की महिमा पर कलंक न होगा? क्या हम इसका विरोध न करेंगे? और यदि शासन-सत्ता के बल से वही तिथि कलीसिया पर आरोपित कर दी जाए, तो दो–तीन पीढ़ियों के बाद वह एक प्रथा बनकर स्थिर हो जाएगी। तब फिर यही तर्क सुनाई देंगे कि “इसमें गलत क्या है? यह तो प्रभु के लिए ही है; हम किसी कृष्ण की पूजा तो नहीं कर रहे; हमारी तो ऐसी कोई भावना ही नहीं; और जब ऐसा है तो प्रभु हमारे मनोभाव को ही देखेंगे।” क्रिस्मस भी ठीक इसी प्रकार कलीसिया में प्रवेश कर स्थिर हुआ।
इसलिए यहाँ प्रश्न यह नहीं कि तुम्हारा उद्देश्य क्या है; प्रश्न यह है कि जो कुछ तुम कर रहे हो वह मूर्तिपूजक प्रथा है या प्रभु द्वारा निर्धारित की गई आराधना–पद्धति। इसी कारण किसी भी उत्सव या रीति की उत्पत्ति को ढक देने के लिए “ईमानदारी”, “उद्देश्य”, “भक्ति–भाव” जैसे बहाने पर्याप्त नहीं।
६. सभी दिन परमेश्वर ने ही तो बनाये है?
कुछ लोग यह कहते हैं: “हम सब जानते हैं कि रविवार भी कभी सूर्य-देव की उपासना के लिए प्रतिष्ठित रोमी प्रथा थी। यदि उन्होंने उस दिन का दुरुपयोग किया, तो क्या हम उस दिन का उपयोग न करें? सभी दिन तो परमेश्वर ने ही सृजे हैं; किसी भी दिन को हम उनकी आराधना के लिए समर्पित कर सकते हैं। उन्होंने जैसा किया, हम क्यों छोड़ दें?” यह प्रश्न बहुत-से लोगों को न्यायपूर्ण प्रतीत होता है।
परन्तु यहाँ हम उस आवश्यकता पर विचार कर रहे हैं कि किसी आराधना-दिन की उत्पत्ति का स्वरूप क्या था, और वह क्यों अस्तित्व में आया। रविवार को प्रभु के पुनरुत्थान के आधार पर प्रेरितकाल से ही “प्रभु का दिन” के रूप में पहचाना गया (मरकुस 16:9; यूहन्ना 20:19,26; प्रेरितों के काम 20:7; 1 कुरिन्थियों 16:2; प्रकाशितवाक्य 1:10)। आदिम कलीसिया ने अन्यजातियों को आकर्षित करने के लिए उनके प्रतिष्ठित दिन को लेकर उसमें कोई मसीही कारण नहीं जोड़ा; बल्कि रविवार को विशेष रूप से प्रतिष्ठित करने के पीछे वचनाधारित कारण था।
मुख्य बात यह नहीं कि अन्यजातियों के पर्व-दिन पर आराधना नहीं करनी चाहिए; परन्तु यदि कोई ऐतिहासिक तथ्य यह सिद्ध करता हो कि किसी अन्यजातीय उत्सव को मसीही रूप देकर आगे बढ़ाया गया, तो मैं केवल इतना ही कह रहा हूँ कि ऐसी प्रथा को ग्रहण न किया जाए। मसीही कारण होने और मसीहीकरण करने के बीच अत्यधिक अंतर है।
७. क्या प्रभु येशु हनुक्का पर्व में नहीं गया था?
कुछ लोग यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि यूनानी शासक अन्तियोकुस एपीफनेस ने जब यरूशलेम के मन्दिर को अपवित्र किया था, तब उसके शुद्ध होने के पश्चात् उस मन्दिर को पुनः परमेश्वर के लिए प्रतिष्ठित किए जाने के दिन को प्रतिवर्ष एक पर्व के रूप में मनाने का नियम उस समय के यहूदी नेता, यहूदा मकबी ने स्थापित किया। और यह भी वचन में लिखा है कि एक बार प्रभु स्वयं भी इस वार्षिकोत्सव के समय वहाँ गया था (यूहन्ना 10:22)। अतः वे कहते हैं, जब वह पर्व परमेश्वर द्वारा निर्धारित न होते हुए भी प्रभु उसमें सम्मिलित हुए, तो फिर हम उनके जन्म का स्मरण करते हुए कोई उत्सव क्यों न मनाएँ?
किन्तु इस प्रश्न का उत्तर वही है जो ऊपर दिए गए प्रश्न के लिए उपयुक्त था। परमेश्वर द्वारा किए गए किसी भी मंगलकारी कार्य को स्मरण कर हम कृतज्ञता अर्पित कर सकते हैं, और उसकी उपस्थिति में आनन्द के साथ उत्सव मना सकते हैं (भजन संहिता 26:12; 35:18)। कृतज्ञता–उत्सव रखने के लिए वचन में समर्थन भी है, जैसा कि एस्तेर की पुस्तक में प्रकट ‘पूरीम’ के पर्व को देखा जा सकता है (एस्तेर 9:26–28)। परन्तु क्रिस्मस उस प्रकार का उत्सव नहीं है। यह किसी ऐसे दिन की स्मृति में नहीं उपजा जिसमें परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए कोई विशेष उद्धार किया हो। बल्कि यह उस दिन को, जो मूलतः एक अन्य देवता की उपासना से सम्बद्ध सोल-इन्विक्टस उत्सव का दिन था, मसीही जगत में निरंतर बनाए रखने हेतु, एक मसीही तर्क के रूप में प्रभु के जन्म के साथ जोड़ देने से उत्पन्न हुआ।
इसलिए जहाँ पूरीम अथवा हनुक्का वास्तव में उस दिन को स्मरण करने के लिए स्थापित कृतज्ञता–वार्षिकोत्सव हैं जिसमें परमेश्वर ने एक महान कार्य किया, वहीं क्रिस्मस, मसीह–जन्म के आवरण में आगे बढ़ाया गया सोल-इन्विक्टस का उत्सव मात्र है।
८. बाइबिल-लेखकों ने तो अन्यजातियों के विचारों का उपयोग किया था, है न!
यह आज के कुछ भ्रम–फैलाने वाले बुद्धिजीवियों द्वारा भोले–भाले विश्वासियों को सिखाया जाने वाला एक नवीन बहाना है। वे यह कहते हैं कि बाइबिल के लेखकों ने अपने सिद्धान्तों को प्रकट करने के लिए अन्यजातियों के विचारों का सहारा लिया; अतः सुसमाचार के लिए अन्यजातीय पद्धतियों का प्रयोग करना कोई बड़ी समस्या नहीं। परन्तु इनकी दी हुई मिसालों में से केवल एक उदाहरण को ही यदि ध्यान से परखा जाए, तो आपको भी स्वीकार करना पड़ेगा कि इन्हें भ्रमकारक बुद्धिजीवी कहना उचित है।
“आदि में वचन था…” (यूहन्ना 1:1)। वे यह सिखाते हैं कि यहाँ “वचन” अर्थात् लोगोस की धारणा यूहन्ना ने यूनानियों से उधार ली; यूनानी दार्शनिकों के लेखों में समस्त सृष्टि के आदि–कारण ‘लोगोस’ का वर्णन मिलता है, और यूहन्ना ने उसी विचार को अपनाया। परन्तु वे यह नहीं बताते कि प्लेटो जैसे यूनानी दार्शनिक स्वयं अपनी ‘लोगोस’ संबंधी समझ को यहूदियों के तारगूमों (Targums) से ग्रहण कर चुके थे। पाइथागोरस परंपरा के एक दार्शनिक नुमेनियस ने तो यह कहकर प्लेटो पर व्यंग्य किया था कि “क्या प्लेटो यूनानी भाषा बोलने वाला मूसा नहीं!” उसका आरोप था कि परमेश्वर और सृष्टि के विषय में प्लेटो की सारी अवधारणाएँ वास्तव में यहूदी लेखनों से चुराई हुई हैं। इतिहासकार यूसबियस ने तो यह तक सिद्ध किया कि प्लेटो ने यहूदियों की शिक्षाओं को किन–किन स्थानों से ग्रहण किया।
अतः यह स्पष्ट है कि यूहन्ना ने अपने “वचन” सिद्धान्त को यहूदी लेखनों और उन पर विद्यमान प्राचीन टीकाओं के आधार पर ही प्रस्तुत किया था; उसने अन्यजातियों से कुछ भी उधार नहीं लिया था। यदि इन बुद्धिजीवियों द्वारा उद्धृत अन्य उदाहरणों की भी सावधानी से जाँच की जाए, तो यह तुरंत समझ में आ जाएगा कि वे अन्यजातीय पद्धतियों के क्रिस्तीकरण को उचित ठहराने के लिए कितने निष्फल प्रयास कर रहे हैं। प्रियजन, सिर्फ इसलिए किसी बात से प्रभावित न हों कि वह विद्वत्तापूर्ण शैली में कही गई है; ऐसी बातों से मूर्ख न बनें।
९. यह तो मसीही स्वतंत्रता से संबंधित विषय है
कुछ लोग इसे मसीही स्वतंत्रता का विषय मानते हुए यह तर्क देते हैं कि रोमियों 14 में पौलुस ने कहा है—एक व्यक्ति किसी दिन को मानता है, दूसरा नहीं मानता; अतः ऐसे विषयों में कोई एक दूसरे पर निर्णय न करे। परन्तु यह शिक्षा उन पर्व–दिवसों के विषय में कही गई थी जिन्हें परमेश्वर ने स्वयं यहूदियों के लिए पुराना नियम में निर्धारित किया था; यह किसी भी प्रकार उन अन्यजातीय उत्सव–दिवसों पर लागू नहीं होती जिन्हें मसीही रूप देकर प्रयोग में लाया जाए। आत्मा से परिपूर्ण किसी भी प्रेरित ने कभी यह नहीं कहा कि परमेश्वर की व्यवस्था के विरुद्ध किसी प्रथा को अपनाने की स्वतंत्रता प्राप्त है। अतः क्रिस्मस, ईस्टर और ऐसे ही बाइबिल–बाह्य उत्सव–दिवसों के लिए रोमियों 14 में दी गई स्वतंत्रता को लागू करने का प्रयास करना केवल अपनी मनमानी को सिद्ध करने हेतु वचन का दुरुपयोग करना ही ठहरेगा।
१०. केवल सुसमाचार सुनाने के लिए
कुछ लोग यह कहते हैं कि “हमें इस पर्व से कोई व्यक्तिगत लगाव नहीं; परन्तु जैसे प्रभु यीशु हनुक्का के समय लोगों की भीड़ को केवल सुसमाचार बताने के अवसर के रूप में उपयोग किया, वैसे ही हम भी इस दिन का उपयोग सिर्फ सुसमाचार प्रचार के लिए कर रहे हैं।” सुसमाचार तो प्रत्येक समय सुनाया जाना चाहिए। किन्तु प्रभु यीशु ने हनुक्का पर्व को मनाया नहीं; वह केवल वहाँ एकत्र हुए जनसमूह को सुसमाचार सुनाने के अवसर के रूप में प्रयुक्त कर रहे थे। परन्तु कलीसिया की स्थापना से लेकर लगभग तीन सौ वर्षों तक, किसी भी मानव–निर्मित प्रथा का सहारा लिए बिना मसीही धर्म ने सुसमाचार के कार्य को अत्यन्त सफलतापूर्वक किया। तो फिर बाद के समय में सुसमाचार प्रचार के लिए ऐसे किसी पर्व की सहायता क्यों आवश्यक हो गई—इस पर विचार क्यों नहीं किया जाता?
1 शमूएल 15 में हम देखते हैं कि शाऊल ने वही वस्तुएँ, जिन्हें यहोवा ने स्पष्ट रूप से निषिद्ध किया था, “यहोवा को अर्पित करने” के बहाने ले आया। इस विचार और उस प्रवृत्ति में कोई अंतर नहीं—जिसमें आज कुछ सुसमाचारिक जन, परमेश्वर की सेवा के नाम पर, उन्हीं विधियों को कलीसिया में प्रवेश देने का प्रयत्न कर रहे हैं जिन्हें परमेश्वर ने स्वीकार नहीं किया। ऐसी बातों पर तब भी परमेश्वर की प्रतिक्रिया वही थी, और आज भी वही है (1 शमूएल 15:22–23)।
सुसमाचार–परिचर्या को किसी भी मानव–निर्मित पद्धति की सहायता की आवश्यकता नहीं; परन्तु उन पर्वों को बनाए रखने के लिए अवश्य ही “सुसमाचार” का बहाना चाहिए होता है!
११. यदि हम क्रिस्मस मनाना न छोड़ें, तो क्या हम स्वर्ग नहीं जाएँगे?
इस प्रश्न का उत्तर तो सम्भवतः आपको मेरे प्रारम्भिक परिचय में ही मिल गया होगा। हर बात को स्वर्ग और नरक से जोड़कर सोचना केवल अपरिपक्वता का लक्षण है। और यदि बात वहीं तक जाए, तो किसी कार्य को करने या न करने से कोई व्यक्ति धर्मी नहीं ठहराया जा सकता। जो ऐसा सोचते हैं कि किसी आचरण को अपनाने या त्यागने से वे धर्म अर्जित कर सकते हैं, उन्होंने वास्तव में सुसमाचार को समझा ही नहीं। प्रभु यीशु ने क्रूस पर जो कार्य पूरा किया, उसी के अतिरिक्त ऐसा कोई भी धर्म–कर्म नहीं जो मुझे स्वर्ग तक पहुँचा सके। परन्तु परमेश्वर की संतान यह भली-भाँति जानती है कि सभी विषयों में यह जाँच करना कि “क्या यह प्रभु को प्रसन्न करता है", यह इसलिए नहीं करते ताकि वो स्वर्ग जाऐ, बल्कि इसलिए कि वो स्वर्ग जा रहे हैं।
१२. क्या ऐसा गुप्त ज्ञान केवल तुम्हीं को मिला है?
कुछ लोग यह आपत्ति उठाते हैं कि “क्या समस्त संसार में मनाया जाने वाला यह उत्सव वचन के अनुसार नहीं—यह बात केवल तुम्हीं को ज्ञात है? इतने बड़े–बड़े दैवी–पुरुष भी इसे मनाते हैं; क्या तुम उनसे बढ़कर हो?”
परन्तु कलीसिया–सुधार के युग से लेकर अब तक ऐसे असंख्य दैवी–सेवक हुए हैं जिन्होंने इस उत्सव को एक रोमन–कैथोलिक प्रथा मानकर स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया, निन्दित किया और यहाँ तक कि निषिद्ध भी किया। सोलहवीं शताब्दी में अमेरिका की प्यूरिटन बस्तियों में क्रिस्मस–आचरण को निषिद्ध ठहराते हुए दंडनीय कानून बनाए गए थे। और 1957 तक स्कॉटलैंड में भी वही निषेध–कानून प्रभावी रहा। ‘प्रिन्स ऑफ़ प्रीचर्स’ कहे जाने वाले विश्वासी और निष्ठावान सेवक चार्ल्स स्पर्जन जैसे व्यक्ति ने भी क्रिस्मस–प्रथा के प्रति अपनी असहमति स्पष्ट रूप से प्रकट की थी। अतः यह कहना कि केवल मैं ही क्रिस्मस का विरोधी हूँ, कदापि उचित नहीं।
यदि तर्क के लिए मान भी लिया जाए कि केवल मैं ही ऐसा कहता हूँ, तो भी यदि जो कुछ मैं कहता हूँ वह वचन के अनुरूप हो, तो केवल यह कहकर कि “तुम अकेले हो”—उसे अस्वीकार कर देना कितना न्यायसंगत है, यह आप स्वयं विचार करें।
१३. चार लोग क्या सोचेंगे?
कुछ लोग यह कहते हैं: “जो कुछ आप कह रहे हैं सब सत्य है, परन्तु हमारे घर में कोई समझेगा नहीं; हमारे रिश्तेदार तो हरगिज़ स्वीकार नहीं करेंगे; मेरे मित्र अजीब नज़र से देखेंगे; उनके कारण मुझे कुछ बातों में समझौता करना ही पड़ता है।” परन्तु हम ही तो हैं जो सुसमाचार सुनाते समय किसी अन्य धर्म के व्यक्ति से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह सत्य के लिए अपने परिवार और मित्रों की परवाह किए बिना आज्ञाकारी बने; हम ही तो कहते हैं कि यह सब सत्य के लिए चुकाया जाने वाला मूल्य है। फिर वही हम, जब बात अपने घरों तक पहुँचे, तो किसी भी मूल्य का भुगतान नहीं करते? क्या यही कारण नहीं कि जैसा मैंने पहले कहा, इस विषय को “बहुत छोटी बात” कहकर टालने का प्रयास किया जाता है? अन्यों से बड़ी–बड़ी समर्पण–मूलक अपेक्षाएँ रखने वाले हम, क्या इस ‘छोटी’ आज्ञाकारिता में ही डगमगा जाते हैं? हाँ, स्वभावतः हम मूल्य तो बताना जानते हैं, परन्तु उसे चुकाना हमारी आदत नहीं। दूसरों को शिक्षा देना बाद की बात है; पहले हम स्वयं आज्ञाकारिता सीखें। और ऐसा करने के लिए परमेश्वर की अनुग्रह पर निर्भर रहें।
१४. क्या हमारे पास एक भी अपना पर्व नहीं होना चाहिए?
कुछ लोग यह आपत्ति करते हैं कि “यदि कोई उत्सव न हो, तो न नए वस्त्र पहनने का अवसर मिलेगा, न पकवान बनाने का, न परिवार–परिजनों और मित्रों के साथ आनन्दित होने का, न बच्चों के साथ कोई हर्षमय समय बिताने का।” परन्तु किसने कहा कि हमारे पास कोई पर्व नहीं? प्रत्येक प्रभु–दिवस स्वयं में एक उत्सव है।
क्योंकि बाइबल में सभी पर्व–उत्सव परमेश्वर को स्मरण करने के लिए ही स्थापित किए गए थे। और प्रभु ने स्वयं हमें जिस विधि से उन्हें स्मरण करने की आज्ञा दी अर्थात् प्रभु–भोज (लूका 22:19) उसके साथ वचन–ध्यान और कलीसिया रूप में संगठित आराधना जब प्रभु–दिवस पर सम्पन्न होती है, तो उससे बड़ा उत्सव और क्या? यदि हम ऐसे प्रभु–दिवस को ही एक उत्सव के रूप में न मना सकें, तो यह हमारा दुर्भाग्य है। इस प्रकार देखें, तो वर्ष भर में हमारे पास बावन उत्सव हैं। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर हमारे जीवन में जो अनेक भलाईयाँ करता है, उन्हें स्मरण करते हुए हम कृतज्ञता–सभाएँ आयोजित कर सकते हैं; कलीसिया, परिवार, मित्रों और पड़ोसियों को आमन्त्रित कर सकते हैं; बच्चों के साथ आनन्दपूर्वक समय बिता सकते हैं; और उसे सुसमाचार सुनाने का अवसर भी बना सकते हैं। और जब ये सब भी परमेश्वर द्वारा हमारी जीवन–यात्रा में प्रदान की गई उत्सव–सदृश व्यवस्थाएँ ही हैं, तब फिर यह शिकायत कि “हमारे पास कोई उत्सव नहीं”—निरर्थक ही ठहरती है।
व्यक्तिगत कृतज्ञता–सभाएँ जिस प्रकार हम रखते हैं, उसी प्रकार क्रिस्मस को भी क्यों न मना लें—ऐसा कुछ लोग तर्क दे सकते हैं। परन्तु व्यक्तिगत कृतज्ञता–सभा कोई ऐसी रीति नहीं जिसे हम कलीसिया पर एक अनिवार्य आचार के रूप में आरोपित करें; और किसी भी आचार को इस प्रकार अनिवार्य बनाना—यहाँ तक कि भोजन से पहले हाथ धोने जैसे छोटे विषय में भी—प्रभु यीशु ने स्वीकार नहीं किया (मत्ती 15:1–6)। तब फिर हर वर्ष कलीसिया पर एक नई परंपरागत प्रथा के रूप में कोई अतिरिक्त बोझ लादने का अधिकार या सत्ता किसी को प्राप्त है—यह मानना वचन के अनुरूप नहीं।
समापन
अन्यजातियों की प्रथाओं को निषिद्ध करते हुए (यिर्मयाह 10:2), और यह स्पष्ट आज्ञा देते हुए कि “वे अपने देवताओं के लिए जो कुछ करते हैं, तुम मेरे लिए वैसा न करना” (व्यवस्थाविवरण 12:30–31), तथा जिन आराधना–विधियों का उसने आदेश नहीं दिया, उन्हें “परायी आग” ठहराया (लैव्यव्यवस्था 10:1–2), और यह चेतावनी देते हुए कि मानव–परंपराएँ उसके वचन को निष्फल कर देती हैं और हमारी आराधना को व्यर्थ बनाती हैं (मत्ती 15:6–9)—ऐसे परमेश्वर के इतने स्पष्ट वचन को ठुकराकर, यह सब तुम किसके लिए कर रहे हो?
परमेश्वर ने जिस बात को न करने की आज्ञा दी हो, वही बात उसे अर्पित करना या उसके नाम पर करना—यह आराधना नहीं, अपितु उसके प्रति अस्वीकार और अपमान है। यदि तुम्हारा कोई मित्र बार–बार यह कहे कि अमुक वस्तु उसे न दी जाए, और फिर भी तुम वही वस्तु बार–बार उसे भेंट में ले जाओ, तो क्या वह प्रसन्न होगा? पहली बार वह इसे अज्ञानता मानेगा, दूसरी बार उपहास समझेगा; परन्तु यदि वर्ष में दो–तीन बार, और फिर हर वर्ष उसी बात को दोहराते रहो, तो वह इसे क्या समझेगा? प्रभु ने जिन बातों को निषिद्ध किया है, उन्हें करते रहना, और जिन बातों को करने की आज्ञा दी है उन्हें छोड़ देना—यही आज के मसीही जगत की रीति हो गई है। परन्तु वचन स्पष्ट कहता है कि प्रभु ने जिन बातों की आज्ञा दी है, उन्हीं को उसके शिष्यों को सीखना चाहिए (मत्ती 28:20), और वे विधियाँ केवल वही हैं जो प्रेरितों की शिक्षा द्वारा कलीसिया को दी गईं है (2 थिस्सलुनीकियों 2:15)।
आइए, हम इसी के प्रति विश्वासयोग्य बने रहने के लिए परमेश्वर की कृपा माँगें।
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